क्या सच में इंसान का मूल स्वभाव प्रेम है?

हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हर ओर संघर्ष दिखाई देता है। हम हिंदू और मुस्लिम के नाम पर लड़ रहे हैं। हम जाति और धर्म के नाम पर विभाजित हैं। हम देश और विदेश, भाषा और क्षेत्र, औरत और मर्द, रंग और रूप, यहाँ तक कि विचारों और भावनाओं के आधार पर भी एक-दूसरे से टकरा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे मनुष्य ने अपने चारों ओर असंख्य दीवारें खड़ी कर ली हैं और फिर उन्हीं दीवारों के भीतर स्वयं को कैद कर लिया है।

विडंबना यह है कि हम स्वयं को पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी कहते हैं, लेकिन शायद हम ही ऐसे प्राणी हैं जो सबसे अधिक विभाजन करते हैं। हमने धर्मों को बाँटा, जातियों को बाँटा, देशों को बाँटा, समाज को बाँटा और जब इन सबसे मन नहीं भरा तो प्रकृति को भी बाँट दिया। जंगल, नदी, पहाड़, झरने, हवा और पानी— जो किसी एक के नहीं, पूरी सृष्टि के हैं— उन्हें भी हमने अपने स्वार्थ और अधिकार के तराज़ू पर तौलना शुरू कर दिया।

हमारी विभाजनकारी प्रवृत्ति यहीं नहीं रुकती। हम पशुओं तक को अपने विचारों और मान्यताओं का हिस्सा बना लेते हैं। गाय, बकरी, कुत्ता, बिल्ली— ये सब हमारे संघर्षों के विषय बन जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे हमें किसी न किसी कारण की आवश्यकता होती है ताकि हम अपने भीतर जमा असंतोष, भय और अहंकार को बाहर निकाल सकें।
यदि हम थोड़ा गहराई से देखें तो पाएँगे कि मनुष्य का अधिकांश संघर्ष बाहर नहीं, भीतर है। बाहर के युद्ध केवल भीतर की अशांति का विस्तार हैं। अहंकार हमें श्रेष्ठ साबित करना चाहता है। स्वार्थ हमें केवल अपना हित दिखाता है। लालच हमें और अधिक पाने की भूख देता है। क्रोध हमें दूसरों को शत्रु के रूप में देखने की आदत सिखाता है। यही कारण है कि हम केवल समाज से नहीं, स्वयं से भी लड़ रहे होते हैं।
इसके बावजूद हम बार-बार एक बात दोहराते हैं—
“इंसान का मूल स्वभाव प्रेम है।”
यह एक सुंदर विचार है, लेकिन क्या यह पूरी तरह सच है?
यदि प्रेम ही मनुष्य का सहज स्वभाव होता, तो क्या हमें प्रेम सिखाने के लिए इतने धर्मग्रंथों, संतों, पैगंबरों, अवतारों और महापुरुषों की आवश्यकता पड़ती? यदि प्रेम हमारे भीतर स्वाभाविक रूप से उपस्थित होता, तो इतिहास युद्धों, रक्तपात, भेदभाव और हिंसा से इतना भरा हुआ क्यों होता?
शायद यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझने की आवश्यकता है। प्रेम मनुष्य का स्वभाव कम और उसकी सबसे बड़ी संभावना अधिक है। क्रोध, भय, ईर्ष्या और अहंकार सहज रूप से उत्पन्न हो जाते हैं, लेकिन प्रेम एक साधना है। प्रेम एक चुनाव है। प्रेम वह चेतना है जिसे मनुष्य को अपने भीतर जागृत करना पड़ता है।

जब एक बच्चा जन्म लेता है, तब उसके भीतर न कोई धर्म होता है, न कोई जाति, न कोई ऊँच-नीच। वह केवल जीवन होता है। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज उसे पहचानें देता है, सीमाएँ देता है और कभी-कभी नफ़रत के कारण भी दे देता है। धीरे-धीरे वह सीख जाता है कि कौन अपना है और कौन पराया। यहीं से विभाजन की शुरुआत होती है।

समस्या यह नहीं है कि दुनिया में विभिन्नताएँ हैं। समस्या यह है कि हमने विभिन्नताओं को विरोध में बदल दिया है। भिन्न होना स्वाभाविक है, लेकिन शत्रु होना स्वाभाविक नहीं। दुर्भाग्य से हम अक्सर इन दोनों के बीच का अंतर भूल जाते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम प्रेम के नए नारे गढ़ें। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर झाँकें और यह समझें कि हम इतनी आसानी से घृणा की ओर क्यों आकर्षित हो जाते हैं। जब तक मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, भय और स्वार्थ को पहचान नहीं लेता, तब तक प्रेम केवल भाषणों और पुस्तकों का विषय बना रहेगा।

इसलिए जब हम कहते हैं कि “इंसान का मूल स्वभाव प्रेम है”, तो शायद हमें यह भी जोड़ देना चाहिए कि प्रेम उसकी सबसे सुंदर संभावना है, लेकिन उसे पाने के लिए मनुष्य को स्वयं पर विजय प्राप्त करनी होगी।
क्योंकि सच्चा युद्ध किसी धर्म, जाति, देश या विचारधारा से नहीं है। सच्चा युद्ध मनुष्य के भीतर बैठे उस अँधेरे से है जो उसे दूसरों से अलग और श्रेष्ठ मानने का भ्रम देता है।
जिस दिन मनुष्य इस भ्रम से मुक्त हो जाएगा, उस दिन प्रेम केवल एक शब्द नहीं रहेगा। वह जीवन का स्वभाव बन जाएगा। और शायद उसी दिन यह पृथ्वी थोड़ी अधिक मानवीय, थोड़ी अधिक सुंदर और थोड़ी अधिक शांत हो सकेगी।
डॉ श्वेता श्रीवास्तव अज़ल
(लखनऊ )