बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की: एक पुनर्विचार

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना किसने की: एक पुनर्विचार

(स्व. श्री आनंद मोहन शरण, प्रोफेसर, मैकेनिकल इंजीनियरिंग, मेमोरियल यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यू फाउंडलैंड, कनाडा एवं श्री भैरव लाल दास, प्रोजेक्ट ऑफिसर, बिहार लेजिस्लेटिव काउंसिल, पटना के अंग्रेजी में उपलब्ध शोधपत्र का अनुवाद एवं आधारित आलेख)

डॉ. कौशल अजिताभ
पेनसिलवेनिया, यू.एस.ए.

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय मुख्यतः एक ही व्यक्ति पंडित मदनमोहन मालवीय को दिया जाता है। लेकिन, यह एक भ्रम है जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और कई इतिहासकारों ने इस विषय का पुनरावलोकन किया भी है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) की स्थापना क्यों की गई और किन व्यक्तियों और संस्थाओं ने किस कारण इसमें योगदान किया — इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए उस समय की पृष्ठभूमि का अवलोकन करना जरूरी है।

ईस्ट इंडिया कंपनी के लगभग 100 सालों के शासन के बाद जनता का विद्रोह ‘सिपाही आंदोलन’ के रूप में 1857 में अभिव्यक्त हुआ। इस आंदोलन में हिंदू और मुस्लिम — दोनों सम्प्रदायों ने एक साथ लड़ाई लड़ी। और, इस आंदोलन के बाद ही भारत पर ब्रिटेन का सीधा शासन लागू हुआ। ब्रिटिश संसद में कुछ भारतीयों (जैसे – दादाभाई नौरोजी) ने भारत की स्वतंत्रता का दावा पेश किया। दूसरी ओर बंगाल में भी स्वतंत्रता आंदोलन तेजी से जोड़ पकड़ रहा था। ‘भारतीय नेशनल कांग्रेस’ की स्थापना कलकत्ता में 1885 में हुई जिसमें दादाभाई नौरोजी का मुख्य योगदान था। कांग्रेस-द्वारा भारत की स्वतंत्रता की माँग सबसे पहले नौरोजी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में 1906 में प्रस्तुत किया। इन उपर्युक्त घटनाओं ने ब्रिटिश शासन को सावधान कर दिया।

पंडित मदनमोहन मालवीय का जन्म 1861 में एक ब्राह्मण परिवार में तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस (आधुनिक उत्तरप्रदेश) में हुआ था। उनकी शिक्षा ‘मुइर सेंट्रल कॉलेज’ (आधुनिक इलाहाबाद विश्वविद्यालय) और उसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से हुई थी। उनका झुकाव पश्चिमी शिक्षा-पद्धति की तरफ था।

दूसरी तरफ, महात्मा गाँधी पश्चिमी शिक्षा के पक्ष में नहीं थे और इसी कारण से एक अलग संस्था “काशी विद्यापीठ” की स्थापना बनारस में हुई जो पश्चिमी शिक्षा पर आधारित नहीं थी।
ब्रिटिश शासन ने स्वतंत्रता आंदोलन को तेज होते देख “फूट डालो और राज करो” का खेल शुरू कर दिया। सबसे पहले तो 1905 में बंगाल का विभाजन किया गया, जो हिंदू और मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों के आधार पर था। दूसरी ओर ईसाई मिशनरी हिंदुओं को निम्न दृष्टि से देखते थे और हिंदुओं के लिए पश्चिमी शिक्षा के पक्ष में नहीं थे। लेकिन ब्रिटिश शासन भारतीयों के लिए पश्चिमी शिक्षा के पक्ष में थी — खासकर उच्च वर्गीय हिंदू और मुस्लिम लोगों के लिए। और, यह ब्रिटिश शासन के निजी स्वार्थ-वश था। उनका स्वार्थ था कि पश्चिमी शिक्षा प्राप्त लोग उच्चवर्गीय भारतीय सिविल सेवा या अन्य शासकीय कार्यों में नियुक्त किए जा सकेंगे — और स्वाभाविक है कि तब वे स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लेंगे।

अतः ब्रिटिश शासन ने इस संबंध में दरभंगा महाराज को नियुक्त किया कि वे विभिन्न रियासतों (Princely states) की एक समिति बनाकर उसका नेतृत्व करें एवं विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए संसाधनों की व्यवस्था करें। साथ ही, ब्रिटिश शासन इस समिति के माध्यम से विश्वविद्यालय पर शासकीय कंट्रोल स्थापित रख सकती थी जो उनके निजी स्वार्थ का एक हिस्सा था।

इसी प्रसंग में एनीबेसेंट का भी जिक्र आवश्यक है। एनीबेसेंट एक ब्रिटिश समाजवादी थियोसोफिस्ट थीं और भारतीयों के स्वराज के पक्ष में थीं। उन्होंने भी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना में अत्यंत सक्रिय भूमिका निभाई थी।

दरभंगा महाराज की अध्यक्षता में एक समिति की स्थापना की गई और ब्रिटिश शिक्षा सचिव सर हारकोर्ट बटलर को 10 अक्टूबर 1911 को एक पत्र में बी.एच.यू. की स्थापना का प्रस्ताव रखा गया। बटलर ने भी दरभंगा महाराज को इस योजना का नेतृत्व करने का प्रस्ताव रखा।

इन ऐतिहासिक तथ्यों से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने अपने-अपने निजी स्वार्थवश बी.एच.यू. की स्थापना में योगदान किया जबकि गाँधीजी और मिशनरी इस पक्ष में नहीं थे। दूसरी ओर, रियासतें और ब्रिटिश शासन इसके पक्ष में थी ताकि विश्वविद्यालय-द्वारा प्रशिक्षित उच्चवर्गीय लोग शासकीय कार्यों में आयेंगे और इस कारण वे विद्रोह या आंदोलन में भाग नहीं लेंगे — चाहे ब्रिटिश शासन हो या रियासतें!

1905 के बंगाल-विभाजन के बाद ब्रिटिश शासन ने “फूट डालो और राज करो” का खेल जारी रखा और इसी कारण हिंदुओं और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग विश्वविद्यालयों — बी.एच.यू. और ए.एम.यू. (अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) की स्थापना की गई।
उपर्युक्त तथ्यों और विश्लेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि — यद्यपि पं. मदनमोहन मालवीय का बी.एच.यू. की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन स्थापना का पूर्ण श्रेय उन्हें देना उचित नहीं है। दरभंगा महाराज ने काफी योगदान किया था – आर्थिक दृष्टि से और साथ ही स्थापना समिति का नेतृत्व कर। अन्य रियासतों के साथ-साथ उन्होंने स्वयं काफी धन भी प्रदान किया था। उनके योगदान को उचित श्रेय मिलना जरूरी है। रियासतों का योगदान खासकर आर्थिक ही सही, काफी सराहनीय है— यद्यपि यह उनके निजी स्वार्थ-द्वारा प्रेरित था। एनीबेसेंट जिन्होंने निस्वार्थ और सक्रिय योगदान दिया, उनके प्रति भी भारतीय ऋणी रहेंगे।

डॉ कौशल अजिताभ