इंतज़ार

झर-झर बह रही हैं शीतल हवाएँ,
कुछ कह रही हैं – सुनो, तुमसे।
पत्तों की सरसराहट में
कोई अनकही आह सुनाई देती है।
सुबह हो या साँझ,
खिड़की पर हर आहट ठहर जाती है,
जैसे शायद तुम मिलने आए हो मुझसे।
घटाएँ घिर आई हैं घनी,
लगता है बरसात होने वाली है।
यह सूनी-सी रात
भीगने वाली है।
चाँद भी आज नज़र नहीं आता,
मतवाली रात
धीमे-धीमे इठलाती फिरती है।
दूर कहीं कोई पपीहा
विरह का गीत सुनाता है।
एक हूक जिगर में उठती है,
कुछ दर्द-सा दिल में होता है।
हर हवा का झोंका जैसे
तेरा नाम पुकार जाता है।
मैं तुम्हारी आहट खोजती हूँ,
हर दस्तक, हर साया
तुम्हारा ही भ्रम दे जाता है।
रात की भीगी ख़ामोशी में
यादों का एक दीप टिमटिमाता है।
आँखों में एक सपना जागता है,
पर हर सपना
भोर से पहले ही बिखर जाता है।
अब सुबह भी होने वाली है,
उजाला धीरे-धीरे उतर रहा है।
मगर मेरा इंतज़ार
अब भी उसी खिड़की पर बैठा है,
जहाँ हर आती-जाती हवा से
मैं तुम्हारा नाम पूछती हूँ।
शायद किसी दिन
यही शीतल हवाएँ
तुम्हारे आने का संदेश भी लाएँ,
और तब यह लंबी विरह-रात
प्रेम की भोर में बदल जाए।
डॉ बाला श्रीवास्तव
(लखनऊ)
