छंद मीटर: 2222, 2222

(शिवलीला)

शिव अविनाशी, शिव अविलासी
शिव ही गंगा, शिव हैं काशी।

शिव ने पाला, जगत निराला
शिव नैनों से, देख उजाला।।

साध्य शिव हैं, साधक योगी
तप, बल के हैं, शिव संयोगी।

पूजा शिव हैं, पावन शिव हैं
भय भी शिव हैं, भावन शिव हैं।।

जड़ चेतन शिव, फल भी शिव हैं
श्वास कहें हल-चल भी शिव हैं।

शिव ही तपस्या, मेला शिव हैं
टक-टक करती, बेला शिव हैं।।

शिव पशुपति श्री, नाथ हमारे।
शंकर बन संकट से तारे।

शिव विष मारे, सोच निखारे
हर हर भज जन, भाग्य सँवारे।।

शिव हैं अनादि, शिव अनुरागी
शिव के साधक, संत वैरागी।

शिव ही दौलत, वैभव सारे
शिव शिव शिव शिव, देव विचारे।।

शिव प्रचंड हैं, शिव ही धीरज
प्रलय शिव हैं, शिव ही नीरज।

शिव कण कण में, आप विराजे
शिव कृपा से, घुंघरू बाजें।।

शिव आनंद हैं, शिव ही चिंतन
शिव से पुष्पित, बौद्धिक मंथन।

शिव विश्वास हैं, शिव ही साथी।
शिव ही दीपक, शिव ही बाती।।

भोले बनकर किस्मत तारे
सृष्टि चलती शिव के सहारे।

शिव शिव बोले, जिह्वा जब-जब
मूल्य मुखर हो, जाए तब-तब।।

मौत डराएगी क्या उसको
शिव संरक्षण, हो जब जिसको।

तुम ही प्रारंभ, अंत तुम्ही हो
तुम ही वेद हो, जंत तुम्हीं हो।

पथ भी तुम हो, मंज़िल तुम हो
धड़कन तुम हो, दिल भी तुम हो।

निद्रा शिव हैं, सपना शिव हैं
सबको लगता, अपना शिव हैं।

अलग न मानो, हरिहर को तुम
शिव नारायण, केशव शिव हैं।

मूल वही बस, नाम अलग हैं
परमब्रह्म तुम, धाम अलग है।

शिव अविनाशी, शिव अविलासी
शिव ही गंगा, शिव हैं काशी।

शिव ने पाला, जगत निराला
शिव नैनों से, देख उजाला।।

कवि:
महेश कुमार हरियाणवी
झूक, महेन्द्रगढ़, 123029
9015916317