शिकार नहीं शिल्पकार -Lokriti Gupta Anokhi

शिकार नहीं शिल्पकार

सुहानी की आंख खुली, अधमून्दी आँखों से उसने अपना माथा पकड़ते हुए सब कुछ देखने समझने की कोशिश की। उसका सर चकरा रहा था। जी मिचला रहा था और उसने पाया की एक आदमी जो अपने एक हाथ से गाड़ी की स्टेअरिंग की कमान संभाले हुए था दूसरे हाथ से उसके सीने पे हाथ फेर रहा था और बीच-बीच में उसे चूमे जा रहा था। गाड़ी की गति बहुत तिव्र थी और बाहर सन्नाटा और जंगल दिख रहा था। सुहानी अब भी खुद को असहाय महसूस कर रही थी और चाह कर भी उसके कंधे से खुद को अलग नहीं कर पा रही थी। मानो कि वो बेहोशी से जागी हो। वो धीरे-धीरे होश में आई और खुद को संभाला। अब उसे सब कुछ साफ नजर आ रहा था घनी दाढ़ी और बालों के साथ वो ठीक-ठाक दिखने वाला युवक, जिसे वह नहीं जानती थी और जो अब तक उसके अंगों को स्पर्श कर रहा था और उसे चूमता आ रहा था वो उसके साथ इस कार में इस सुनसान जगह में कैसे पहुंची? अब आगे क्या होगा? क्या वो किडनैप हो चुकी है? क्या वो अब बिकने वाली है, मानव अंगों की तस्करी या फिर देह व्यापार….? भीतर से ऐसे सवालों के गोते खाती पर बाहर स्वयं को एकदम शांत अवस्था में बिठा के रखा था। 10 मिनट बीत चुके थे उसकी शांति देख मोहित से रहा न गया और अंततः उसने तिरछी मुस्कान से पूछा “डर लग रहा है क्या डार्लिंग?” वो अब भी शांत रही। उसकी शांति ने मोहित को अशांत कर दिया और उसने दुबारा पूछा “तुम्हें पता भी है तुम किडनैप हो चुकी हो… क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा?” “अच्छा तो अब आगे का क्या प्लान है?” “आगे का क्या…. मैं तुझे लूटने वाला हूँ।” “अच्छा! वाह… व्हाट अ कोइन्सिडेंस! तुम मुझे लूटना चाहते हो और मैं खुद लुटना चाहती हूँ। अच्छा ये बताओ कि कॉन्डोम है तुम्हारे पास? उफ़! फिर एक मुर्ख पुरुष… तुम्हें तो पता है न कि असुरक्षित यौन सम्बन्ध से एड्स हो सकता है।” “कहाँ से होगा? मुझे है नहीं और तुम्हें होने का कोई चांस ही नहीं है।” कहते हुए वो सुहानी की ओर देख फिर मुस्काया।” “अच्छा, एक बात बताओ अगर मुझे सच में एड्स हुआ तो? और मुझसे तुमको हो गया तो ये लूट भारी पड़ जाएगी।” मोहित के चेहरे पे सकपकाहाट थी। सुहानी ने आगे कहा “अच्छा चलो मैं क्लियर कर ही देती हूँ। मुझे पिछले 2 सालों से एड्स है और मैं उसकी दवा लेती हूँ, ‘राफ़टेसोल टी.जी प्लस 500 एम जी’। यकीन नहीं आता तो गूगल कर लो। मैंने भी तुम्हारी तरह बिना कॉन्डोम के संबंध बनाती रही और नतीजा ये हुआ।” कहते हुए सुहानी ने उसका हाथ अपने सीने पे रखा दिया। मोहित ने अपना हाथ पिछे खिंचा और गाड़ी वापस शहर की तरफ घुमाया। वो मन-ही-मन खुद को कोस रहा था ‘न जाने वो भी किसे उठा के ले आया। दिखने में तो एकदम सोलह-सतरह साल की कमसिन कली लगती है सोचा था कि मजे लूंगा, ये चिल्लायेगी, घबराएगी और ये जितना तड़पेगी उतना ही रौंदूँगा। ये गिड़गिड़ाती कि घर में माँ-बहन नहीं है क्या? प्लीज़ मुझे छोड़ दो… जाने दो। और मैं ये कहते हुए कि ओहो-हो ऐसे कैसे जाने दूँ मेरी जान? माँ-बहन तो है पर तू नहीं है न। इसके कपड़े उधेड़ता। उफ़! कहाँ फंस गया इसे तो एड्स है। छी-छी कहाँ-कहाँ मुंह मार के बैठी है। कैसे संस्कार हैं? कितने गिरे हुए माँ-बाप होंगे इसके। जिस लड़के से शादी करेगी उसकी तो जिंदगी ही बर्बाद हो जाएगी।’


फिर भी दैहिक कामुकता शांत न हुई और होती भी कैसे इतनी मेहनत से उसे किडनैप किया गाड़ी का तेल जलाया। अब मेहनत का फल खाना तो बनता था न? “तुम्हारी कोई बहन है?” “क्यों तुझे उससे क्या?” “नहीं बस ऐसे ही… मतलब नहीं है।” “हाँ है पर तुझे जैसी बदचलन नहीं है और हाँ एक और बात मेरे माँ-बाप ने बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं उसे।”
“सुनो क्यों मूड स्पॉयल करते हो? मैं तुम्हें पूरा मजा दूँगी एकदम सनी लिओनी टाइप लेकिन मेरी भी कुछ शर्त है।” “क्या?” “शील भंग होने के बाद मैं फिर पहले जैसे हो जाती हूँ मतलब कोई मुझे पहचान नहीं सकता कि मैंने अपनी वर्जिनिटी कभी लूज़ भी की है तो मेरे भीतर केवल तुम संयम के साथ प्रवेश करोगे कोई भी बोतल, ब्लेड या चाकू जैसी चीज नहीं, तुम मुझे रौंदूँगे, कुचलोगे या काटोगे नहीं मेरे बदन को कोई यातना नहीं दोगे,मेरे शरीर पे कोई दाग़ नहीं होना चाहिए और इसके बाद मुझे वापस उसी जगह छोड़ना जहाँ से उठाया था।”
“अच्छा! और मैं अगर ऐसा न करूँ तो क्या करोगी?” “पुरानी खिलाडी हूँ…तो बस तुम भी यातनाओं के लिए तैयार रहना हो सकता है कि फिर तुम दुबारा ये सब करने लायक ही न बचो और फिर बाप बनना तो दूर की बात होगी।” कहते हुए सुहानी ने तिरछी मुस्कान दी।
मोहित के माथे से पसीना टपक रहा था और दस किलोमीटर पीछे आने के बाद वो कार में सुहानी को लॉक करके कॉन्डोम खरीदने निकला। सुहानी ने कोशिश की लेकिन गाड़ी साउंड प्रूफ थी बाहर कोई आवाज न निकली और शाम ढल चुकी थी इसलिए किसी को वो दिखाई भी न पड़ी। उसका मोबाइल शायद मोहित ने फेंक दिया था, जो उसके पर्स में नहीं था। मोहित गाड़ी के अंदर बैठ गया और गाड़ी का रुख जंगल की ओर किया। अब उसके चेहरे पर मुस्कान थी। सुहानी ने उसका हाथ वापस अपने सीने पर रख दिया और खुद को ढीला छोड़ कर उसके कंधे पर सर टिका दिया। दृश्य बड़ा मनमोहक, मानो प्रेमी युगल लॉन्ग ड्राइव पे जा रहे हों।
“अच्छा सुनो हमलोग जा कहाँ रहे हैं?” “तुम्हें पता नहीं कि मैं किसका बेटा हूँ आगे लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पे फार्म हाउस है मेरे एकड़ की जमीन है। कोई नहीं है अभी वहाँ खूब मजे करेंगे।” सुहानी ने अपने स्पर्श रुपी वाण उसके अंगों पे मारे और उसे बहुत उत्तेजित कर दिया और बोली “अब रहा नहीं जाता चलो न कार में ही करते हैं क्या उतनी दूर जाना। यहाँ भी सन्नाटा है, तन्हाई है और हम दोनों ही हैं और तुम्हारी कार बहुत आरामदायक है। वहाँ तो जाते-जाते ही मूड ख़राब हो जायेगा। मोहित को उसका आईडिया अच्छा लगा और उसने कार को एक अच्छे और सुरक्षित महसूस होने वाली जगह पे लगाया और कार सिसकियों से भर गया।
कुछ देर बाद दोनों सम्भले और कार शहर की ओर मोड़ लिया गया। “सुनो क्या तुम वर्जिन थी। सच कितनी मशक्कत करनी पड़ी मुझे लेकिन बहुत संयम दिखाया मैंने भी। है न? शायद मुझे बाकि लड़कियों के साथ भी ऐसा ही करना चाहिए था। लेकिन वो सब तुम्हारे जैसी कहाँ होती हैं। इतना ज्यादा विरोध कि उनके साथ ज़्यादती करनी पड़ती है।”
गाड़ी आगे चलती रही और सुहानी सुहानी सी मुस्कान बिखेरती रही। वो शांत रही चुप रही जब उसने देखा कि अपना इलाका आ गया है तो उसने चुप्पी तोड़ी। “अगर मैं कुछ कहना चाहूँ तो सुनना पसंद करोगे?” “हाँ बिल्कुल।” तुम कौन हो, किसके बेटे हो मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। तुमने ऐसा कुछ भी मेरा नहीं लिया और अगर लिया भी तो मैंने भी तुम्हारा लिया। मैं वर्जिन थी कि नहीं ये तो बस महसूस करने का विषय है लेकिन यहाँ का सिस्टम नग्न है तो तुम भी नग्न और मैं भी… तुमने जिस अवस्था में मुझे देखा मैंने भी तुम्हें देखा बात और हिसाब बराबर। मैं भागती-लड़ती तो कितनी दूर तक? उस विराने वन में कौन सुनता मेरी चिंखें और अगर मैं तुम्हारी हत्या भी कर देती यो वापस कैसे आती? और अगर तुम मेरा बलात्कार करते तो डॉ. के हाथ मेरे देह के चीथड़े सिलने में काँपते, मैं बिस्तर पे अंतिम सांसे गिन रही होती मेरे माँ-बाप रो रहे होते, कोर्ट के चक्कर काट रहें होते, और समाज मेरे कपड़ों और मेरे संस्कार पे तंज कस रहा होता, कुछ लोग मेरी लिए कैंडल मार्च निकालते, समाज सेवी टिप्पणीयां देते, मीडिया वाले कुछ दिन ये सब हाई लाइट करते और तुम अपने बाप के दम पे बच जाते इन सबके बीच या तो मैं बचती नहीं और यदि बचती तो ऐसी दैहिक अवस्था होती कि लगता कि इससे अच्छा तो मैं न बचती। इसलिए मैंने कैसे लड़ना है और कहाँ लड़ना है इस बात का चयन किया।
तो तुम बता रहे थे अपनी बहन के बारे में, उसके संस्कारों के बारे में तो मेरी प्रार्थना रहेगी कि ऐसी कार की सीट पे कभी किसी की बहन-बेटी या स्त्री न बैठे लेकिन कैसे न बैठे जब बैठाने वाला खुद किसी का बाप, भाई, और पति ही है। हो सकता है तुम्हारी बहन को बड़े अच्छे संस्कार दिए गए हों पर तुम्हें इससे वंचित रखा गया। मैं देह नहीं हूँ चेतना हूँ, आत्मा हूँ और तुमने जो कुछ भी किया इस देह के साथ किया। सामाजिक व्यवस्था ने स्त्री और पुरुष में भेद-भाव किया। एकतरफे नियम और विचारों को जन्म दिया। ईश्वर ने नहीं एक श्लोक सुनो- श्लोक: नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ २-२३ ॥  अर्थ: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती। 
कर्म कभी माफ़ नहीं करता सूद समेत लौट कर आता है तो कर्मों की खेती में वही बीज बोना जिसकी फसल काटने में आनंद आए। मन को केवल अध्यात्म से ही साधा जा सकता है और कोई दूसरा मार्ग नहीं, कोई डॉ. इसका इलाज नहीं कर सकता। ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि दे और तुम्हारा मंगल करे। यदि चाहो तो दस मिनट सुबह और शाम ज्ञान मुद्रा में बैठना। कुछ नहीं तो कोई नाम जप लेना मगर बैठना तुम धीरे-धीरे स्वयं में परिवर्तन देखोगे।”
मोहित के चेहरे का भाव बदल चुका था। उसने कुंठित होकर सुहानी की ओर देखा मानो वो उससे माफी माँगना चाहता हो, लेकिन इस बार उसकी आँखों में सिर्फ पश्चाताप नहीं था—एक गहरी जद्दोजहद भी थी। वो कुछ कहना चाहता था, पर शब्द जैसे गले में अटक गए थे। “तुम… तुम सच में मुझे माफ़ कर सकती हो?” उसकी आवाज़ धीमी थी, पर भीतर कहीं अहंकार अब भी बाकी था—मानो वो खुद से ही लड़ रहा हो। सुहानी ने शांत स्वर में कहा, “माफ़ी मांगना आसान है, बदलना मुश्किल।” मोहित ने नजरें फेर लीं। उसके भीतर कई आवाज़ें टकराने लगीं— “क्या सच में मैं इतना गिरा हुआ हूँ? क्या सच में मैं ही गलत हूँ… या बस मैं पकड़ा गया हूँ?” क्योंकि ऐसा सब तो करते हैं…” “लेकिन अगर कोई मेरी बहन के साथ ऐसा करे तो?” उसका माथा पसीने से भीगने लगा। कुछ क्षणों तक कार में खामोशी पसरी रही। बाहर सन्नाटा था, पर अंदर एक तूफान उठ रहा था। “मैं… मैं कोशिश करूँगा,” उसने धीमे से कहा, पर खुद को ही यकीन नहीं था। सुहानी ने बिना मुस्कुराए कहा— “कोशिश नहीं, निर्णय लेना पड़ता है।” मोहित ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखा। वहाँ डर नहीं था, घृणा नहीं थी—सिर्फ एक अडिग शांति थी, जो उसे भीतर तक हिला गई। उसने गहरी साँस ली, जैसे अपने ही भीतर से लड़कर बाहर आया हो। “ठीक है… मैं वादा करता हूँ। शायद मैं तुरंत नहीं बदल पाऊँ… पर अब पहले जैसा भी नहीं रह पाऊँगा।” उसकी आवाज़ में अब बनावटीपन नहीं था।थोड़ा डर, थोड़ा अपराधबोध और एक सच्ची कोशिश का बीज था। सुहानी ने आगे कहा, “कोई बात नहीं। मेरे भीतर तुम्हारे लिए कोई क्रोध और द्वेष नहीं… मैं तुम्हें क्षमा कर चुकी हूँ, लेकिन कुछ मांगूँ तो दोगे?”
“अब मैं याचक तुम्हें दे भी क्या सकता हूँ? फिर भी वादा करता हूँ कि दूंगा।” “ठीक है तब ढाई सौ रूपए निकालो।” मोहित को कुछ समझ न आया लेकिन फिर भी उसने उसकी हथेली पर रूपए रख दिए। सुहानी ने अपने बैग में पैसे रखे और उसे बदले में श्रीमदभागवद गीता दिया और कहा कि वचन दो कि इसका पठन चाहे वो एक श्लोक ही क्यों न हो अर्थ सहित आजीवन करोगे और बुरे दोस्त, नशे और संगती त्याग दोगे और जो मेरे साथ किया वो अब कभी किसी लड़की के साथ नहीं करोगे।” मोहित ने सुहानी की हथेली पर अपनी हथेली रखी और बोला “प्रॉमिस!” “ठीक है हो सके तो अपने रुतबे-पैसे को सही कामों में खर्च करना। ईश्वर ने जब तुम्हें इतना कुछ दिया है तो तुम्हारी जिम्मेदारी भी तो बनती है।” मोहित ने सुहानी को उसका फोन वापस किया उसकी आँखों से पश्चातापरुपी अश्रुधार लगातार बह रहे थे। सुहानी जा चुकी थी।

उसने दवाई का नाम गूगल किया। उसके हाथ कांप रहे थे स्क्रीन पर उस नाम की कोई दवाई थी ही नहीं। मोहित आत्मग्लानि से भरा, उसने धीरे से श्रीमद्भागवद गीता खोली— और पहली बार, शब्द नहीं… खुद को पढ़ने लगा। उस दिन वह शिकार बनकर आई थी… और शिल्पकार बनकर लौटी थी।

©लोकृती गुप्ता ‘अनोखी’