माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी

माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी

डॉ विजय गर्ग 

किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसके विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शिक्षकों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि उस वातावरण पर भी निर्भर करता है जो बच्चों को अपने घरों में मिलता है। घर बच्चे की पहली पाठशाला होता है और माँ उसकी पहली शिक्षिका। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि “माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी।” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त सूत्र है।

बच्चे अपने माता-पिता, विशेषकर अपनी माँ, से सबसे अधिक सीखते हैं। वे केवल उनके शब्दों को नहीं सुनते, बल्कि उनके व्यवहार की नकल भी करते हैं। यदि बच्चे अपनी माँ को नियमित रूप से पुस्तकें, समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ या अन्य ज्ञानवर्धक सामग्री पढ़ते हुए देखते हैं, तो उनके मन में भी पढ़ने की आदत स्वतः विकसित होने लगती है। यही आदत आगे चलकर उनके व्यक्तित्व, सोच और सफलता की मजबूत नींव बनती है।

आज का समय तकनीक का युग है। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, टेलीविजन और इंटरनेट ने जीवन को आसान बनाया है, लेकिन इनकी अत्यधिक उपयोगिता ने पुस्तकों से दूरी भी बढ़ा दी है। पहले घरों में शाम के समय अख़बार पढ़े जाते थे, कहानियाँ सुनाई जाती थीं और बच्चों के साथ मिलकर पढ़ाई की जाती थी। आज कई परिवारों में हर सदस्य अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त दिखाई देता है। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ने की आदत और एकाग्रता पर पड़ रहा है।

अनेक शोध बताते हैं कि जिन बच्चों की माताएँ पढ़ने में रुचि रखती हैं, वे भाषा, गणित, विज्ञान और अन्य विषयों में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। ऐसे बच्चों की शब्दावली समृद्ध होती है, उनकी कल्पनाशक्ति अधिक विकसित होती है और वे समस्याओं का समाधान अधिक प्रभावी ढंग से कर पाते हैं। नियमित रूप से पढ़ने वाले परिवारों में संवाद बेहतर होता है और बच्चों का आत्मविश्वास भी अधिक मजबूत होता है।

माँ का पढ़ना केवल बच्चों की शिक्षा तक सीमित नहीं है। एक पढ़ी-लिखी और जागरूक माँ स्वास्थ्य, पोषण, स्वच्छता, आर्थिक प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी अधिक सचेत होती है। वह अपने परिवार के लिए बेहतर निर्णय ले सकती है और बच्चों में अच्छे संस्कार विकसित कर सकती है। इस प्रकार एक माँ की सीख पूरे परिवार और समाज के विकास का आधार बन जाती है।

यह आवश्यक नहीं कि माँ उच्च शिक्षित हो। यदि वह प्रतिदिन कुछ समय पुस्तक पढ़ने, अख़बार देखने, बच्चों को कहानी सुनाने या उनके साथ बैठकर पढ़ने में लगाए, तो इसका सकारात्मक प्रभाव निश्चित रूप से दिखाई देगा। छोटे-छोटे प्रयास ही बड़े परिवर्तन की शुरुआत करते हैं।

विद्यालयों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। स्कूलों को अभिभावक-पठन कार्यक्रम, पुस्तक मेले, कहानी-कथन प्रतियोगिताएँ, पुस्तकालय गतिविधियाँ और परिवार आधारित पठन अभियान चलाने चाहिए। समुदायों और सामाजिक संस्थाओं को भी महिलाओं में पढ़ने की संस्कृति विकसित करने के लिए विशेष प्रयास करने चाहिए। यदि हर मोहल्ले और गाँव में पुस्तकालय तथा सामुदायिक पठन केंद्र सक्रिय हों, तो यह एक नई शैक्षिक क्रांति का आधार बन सकता है।

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता , डिजिटल तकनीक और ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था के दौर में जीवनभर सीखते रहना आवश्यक हो गया है। यदि माताएँ स्वयं सीखने और पढ़ने की आदत बनाए रखेंगी, तो वे अपने बच्चों को भी बदलते समय के अनुरूप तैयार कर सकेंगी। शिक्षा अब केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह निरंतर सीखने की प्रक्रिया बन चुकी है।

इतिहास गवाह है कि अनेक महान वैज्ञानिकों, साहित्यकारों, नेताओं और समाज सुधारकों की सफलता के पीछे उनकी माँ की प्रेरणा, शिक्षा और संस्कार रहे हैं। एक जागरूक माँ अपने बच्चों को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देती, बल्कि उन्हें ईमानदारी, अनुशासन, संवेदनशीलता और मेहनत का महत्व भी सिखाती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हर घर में पुस्तकों के लिए एक छोटा-सा स्थान हो, परिवार प्रतिदिन कुछ समय सामूहिक रूप से पढ़ने के लिए निकाले और बच्चों के सामने पढ़ने की सकारात्मक संस्कृति विकसित की जाए। जब घरों में पुस्तकें लौटेंगी, तब बच्चों में जिज्ञासा, रचनात्मकता और ज्ञान की प्यास भी बढ़ेगी।

अंततः किसी भी समाज का भविष्य उसकी माताओं के हाथों में होता है। एक माँ जब पढ़ती है तो वह केवल स्वयं को शिक्षित नहीं करती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, संस्कार और प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त करती है। इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित है कि “माँ पढ़ेगी तो पीढ़ी आगे बढ़ेगी।” यदि हमें एक शिक्षित, जागरूक, सशक्त और विकसित भारत का निर्माण करना है, तो हमें घर-घर में पढ़ने की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा और प्रत्येक माँ को ज्ञान से जोड़ना होगा। यही आने वाले कल की सबसे बड़ी पूँजी होगी।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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 इम्पैक्ट फैक्टर से आगे: वैज्ञानिकों को अपनी खोजें कहाँ साझा करनी चाहिए?

डॉ विजय गर्ग 

विज्ञान का उद्देश्य केवल नई खोज करना नहीं है, बल्कि उन खोजों को समाज, उद्योग, शिक्षा और मानवता के हित में उपयोगी बनाना भी है। यदि कोई महत्वपूर्ण शोध प्रयोगशाला की चारदीवारी तक ही सीमित रह जाए, तो उसका वास्तविक महत्व अधूरा रह जाता है। इसलिए वैज्ञानिक शोध का सही मंच पर प्रकाशन उतना ही आवश्यक है जितना स्वयं शोध करना।

कई दशकों तक वैज्ञानिक जगत में किसी शोध-पत्र की गुणवत्ता का आकलन मुख्य रूप से उस जर्नल के इम्पैक्ट फैक्टर  से किया जाता रहा, जिसमें वह प्रकाशित हुआ हो। उच्च इम्पैक्ट फैक्टर वाले जर्नल में प्रकाशित होना प्रतिष्ठा, पदोन्नति और अनुदान प्राप्त करने का प्रमुख आधार माना जाता था। लेकिन आज वैज्ञानिक प्रकाशन की दुनिया तेजी से बदल रही है। अब प्रश्न केवल यह नहीं है कि शोध किस जर्नल में प्रकाशित हुआ, बल्कि यह भी है कि वह कितने लोगों तक पहुँचा, कितना उपयोगी सिद्ध हुआ और समाज पर उसका क्या प्रभाव पड़ा।

क्या केवल इम्पैक्ट फैक्टर ही सफलता का मापदंड है?

इम्पैक्ट फैक्टर किसी जर्नल में प्रकाशित लेखों को मिलने वाले उद्धरणों  की औसत संख्या को दर्शाता है। यह जर्नल की लोकप्रियता का संकेत तो देता है, लेकिन किसी एक शोध-पत्र की वास्तविक गुणवत्ता या उसके सामाजिक प्रभाव को पूरी तरह नहीं माप सकता।

कई बार किसी स्थानीय समस्या—जैसे कृषि, शिक्षा, जल संरक्षण, सार्वजनिक स्वास्थ्य या पर्यावरण—पर किया गया शोध लाखों लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकता है, भले ही उसे अपेक्षाकृत कम उद्धरण मिलें। इसलिए वैज्ञानिक समुदाय अब यह स्वीकार कर रहा है कि शोध का मूल्य केवल उद्धरणों से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक योगदान से तय होना चाहिए।

सही पाठकों तक पहुँचना अधिक महत्वपूर्ण

हर शोध का अपना एक लक्षित पाठक वर्ग होता है। यदि शोध चिकित्सा से जुड़ा है, तो उसे डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों तक पहुँचना चाहिए। यदि शोध शिक्षा पर आधारित है, तो उसका लाभ शिक्षकों, विद्यार्थियों और नीति-निर्माताओं तक पहुँचना चाहिए।

इसलिए वैज्ञानिकों को केवल प्रतिष्ठित जर्नल की बजाय ऐसे मंच का चयन करना चाहिए जहाँ उनके शोध को सबसे अधिक प्रासंगिक पाठक मिल सकें। सही मंच पर प्रकाशित शोध का प्रभाव कई गुना अधिक हो सकता है।

ओपन एक्सेस जर्नलों का बढ़ता महत्व

विगत वर्षों में ओपन एक्सेस  प्रकाशन ने वैज्ञानिक दुनिया में नई क्रांति लाई है। इन जर्नलों में प्रकाशित शोध-पत्र इंटरनेट पर सभी के लिए निःशुल्क उपलब्ध होते हैं।

इसके अनेक लाभ हैं—

– शोध अधिक लोगों तक पहुँचता है।

– विकासशील देशों के शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को समान अवसर मिलता है।

– वैज्ञानिक सहयोग बढ़ता है।

– सार्वजनिक धन से किए गए शोध का लाभ आम जनता तक पहुँचता है।

– शोध की दृश्यता और प्रभाव दोनों बढ़ते हैं।

आज कई वित्तपोषण एजेंसियाँ भी चाहती हैं कि उनके सहयोग से किए गए शोध ओपन एक्सेस के माध्यम से प्रकाशित हों।

प्रीप्रिंट सर्वर और डिजिटल प्लेटफॉर्म

अब वैज्ञानिक अपने शोध को औपचारिक प्रकाशन से पहले भी प्रीप्रिंट सर्वर पर साझा कर सकते हैं। इससे अन्य वैज्ञानिक तुरंत अध्ययन कर सकते हैं, सुझाव दे सकते हैं और नए सहयोग स्थापित हो सकते हैं।

इसके अलावा संस्थागत रिपॉजिटरी, डेटा रिपॉजिटरी और डिजिटल शोध मंच भी वैज्ञानिक ज्ञान को अधिक पारदर्शी और सुलभ बना रहे हैं। इससे शोध की पुनरावृत्ति कम होती है और नए अनुसंधान को गति मिलती है।

केवल वैज्ञानिकों तक ही नहीं, समाज तक भी पहुँचे शोध

वैज्ञानिक शोध का अंतिम उद्देश्य समाज का कल्याण है। इसलिए शोध-पत्र केवल तकनीकी भाषा में प्रकाशित करना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिकों को अपने निष्कर्षों को सरल भाषा में भी प्रस्तुत करना चाहिए।

वे अपने शोध को—

– समाचार-पत्रों,

– लोकप्रिय विज्ञान पत्रिकाओं,

– ब्लॉग,

– पॉडकास्ट,

– यूट्यूब,

– सोशल मीडिया,

– सार्वजनिक व्याख्यान,

– तथा विज्ञान विषयक पुस्तकों

के माध्यम से आम लोगों तक पहुँचा सकते हैं। इससे वैज्ञानिक सोच का प्रसार होता है और समाज में विज्ञान के प्रति विश्वास बढ़ता है।

फर्जी  जर्नलों से सावधान

डिजिटल युग में कुछ ऐसे जर्नल भी सामने आए हैं जो केवल शुल्क लेकर बिना उचित समीक्षा के शोध प्रकाशित कर देते हैं। इन्हें प्रिडेटरी जर्नल कहा जाता है।

ऐसे जर्नलों में प्रकाशित शोध वैज्ञानिक की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचा सकता है। इसलिए किसी भी जर्नल में शोध भेजने से पहले उसकी संपादकीय समिति, समीक्षा प्रक्रिया, नैतिक मानकों और प्रतिष्ठा की जाँच अवश्य करनी चाहिए।

वास्तविक प्रभाव क्या है?

आज शोध की सफलता केवल उद्धरणों से नहीं मापी जाती। किसी वैज्ञानिक खोज का वास्तविक प्रभाव तब माना जाता है जब वह—

– नई तकनीकों के विकास में योगदान दे,

– चिकित्सा में सुधार लाए,

– शिक्षा को बेहतर बनाए,

– पर्यावरण संरक्षण में सहायता करे,

– सरकारी नीतियों को दिशा दे,

– उद्योगों में नवाचार को बढ़ावा दे,

– तथा आम लोगों के जीवन को बेहतर बनाए।

विज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।

भविष्य का वैज्ञानिक प्रकाशन

भविष्य में वैज्ञानिक प्रकाशन और अधिक खुला, पारदर्शी तथा सहयोगात्मक होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता , ओपन साइंस, डेटा शेयरिंग और अंतर-विषयक अनुसंधान वैज्ञानिक संचार को नई दिशा दे रहे हैं। शोध केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक सहयोग के माध्यम से अधिक तेज़ी से आगे बढ़ेगा।

वैज्ञानिकों को अब केवल प्रतिष्ठित जर्नलों में प्रकाशित होने की दौड़ से आगे बढ़कर यह सोचना होगा कि उनकी खोज किस माध्यम से अधिक लोगों तक पहुँच सकती है और अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है।

आज के युग में वैज्ञानिक प्रकाशन का उद्देश्य केवल उच्च इम्पैक्ट फैक्टर प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता इस बात में है कि शोध विश्वसनीय हो, अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे, अन्य वैज्ञानिकों को प्रेरित करे और समाज के विकास में योगदान दे। वैज्ञानिकों को ऐसे मंचों का चयन करना चाहिए जो गुणवत्ता, पारदर्शिता, नैतिकता और व्यापक पहुँच सुनिश्चित करें।

अंततः किसी शोध-पत्र का महत्व उस जर्नल की प्रतिष्ठा से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होता है कि वह ज्ञान को कितना आगे बढ़ाता है, मानव जीवन को कितना बेहतर बनाता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होता है। यही विज्ञान का वास्तविक उद्देश्य और वैज्ञानिक प्रकाशन की सबसे बड़ी सफलता है।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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चाइल्डकेयर से आगे: कार्यस्थल पर महिलाओं की प्रगति में बाधा बनने वाली चार अन्य बड़ी चुनौतियाँ

डॉ विजय गर्ग 

आज महिलाएँ विज्ञान, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन, उद्योग, राजनीति और प्रौद्योगिकी सहित लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं। फिर भी कार्यस्थल पर उनकी भागीदारी और नेतृत्व की राह पूरी तरह आसान नहीं है। अक्सर यह माना जाता है कि बच्चों की देखभाल (चाइल्डकेयर) ही महिलाओं के करियर में सबसे बड़ी बाधा है। निस्संदेह यह एक महत्वपूर्ण चुनौती है, लेकिन इसके अलावा भी कई ऐसी रुकावटें हैं जो महिलाओं को उनकी पूरी क्षमता के साथ आगे बढ़ने से रोकती हैं।

यदि वास्तव में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ानी है और उन्हें नेतृत्व के अवसर देने हैं, तो हमें चाइल्डकेयर से आगे बढ़कर उन अन्य चुनौतियों पर भी ध्यान देना होगा जो उनके पेशेवर विकास को प्रभावित करती हैं।

1. लैंगिक पूर्वाग्रह और सीमित नेतृत्व के अवसर

आज भी अनेक संस्थानों में महिलाओं की क्षमता को पुरुषों की तुलना में कम आँका जाता है। महत्वपूर्ण परियोजनाएँ, नेतृत्व की जिम्मेदारियाँ और पदोन्नति के अवसर अक्सर पुरुष कर्मचारियों को अधिक मिलते हैं। कई बार यह मान लिया जाता है कि महिलाएँ पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण लंबे समय तक नेतृत्व की भूमिका नहीं निभा पाएँगी।

इसी सोच के कारण योग्य और प्रतिभाशाली महिलाएँ शीर्ष पदों तक नहीं पहुँच पातीं। इसे अक्सर “ग्लास सीलिंग” (Glass Ceiling) कहा जाता है, अर्थात ऐसी अदृश्य बाधाएँ जो महिलाओं की प्रगति को रोक देती हैं।

2. घरेलू जिम्मेदारियों का असमान बोझ

नौकरी करने के बावजूद घर की अधिकांश जिम्मेदारियाँ आज भी महिलाओं पर ही रहती हैं। खाना बनाना, सफाई करना, बुजुर्गों की देखभाल, बच्चों की पढ़ाई, घरेलू प्रबंधन और परिवार की अन्य आवश्यकताओं का भार अक्सर महिलाओं के कंधों पर होता है।

इस “डबल शिफ्ट” के कारण वे शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाती हैं। परिणामस्वरूप उनके पास कौशल विकास, उच्च शिक्षा, नेटवर्किंग या करियर में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त समय और ऊर्जा नहीं बचती। यदि परिवार में घरेलू कार्यों का समान बँटवारा हो, तो महिलाएँ अपने करियर पर अधिक ध्यान दे सकती हैं।

3. लचीली कार्य नीतियों का अभाव

कोविड-19 महामारी के दौरान यह सिद्ध हो गया कि कई प्रकार के कार्य घर से या लचीले समय के साथ भी सफलतापूर्वक किए जा सकते हैं। इसके बावजूद अनेक संस्थानों में अभी भी कठोर कार्य समय और कार्यालय में अनिवार्य उपस्थिति की नीति लागू है।

वर्क फ्रॉम होम, फ्लेक्सी टाइम, पार्ट-टाइम विकल्प या पुनः कार्यबल में लौटने के कार्यक्रम  जैसी सुविधाओं का अभाव महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती बन जाता है। परिणामस्वरूप अनेक महिलाएँ नौकरी छोड़ने या अपने करियर में समझौता करने के लिए मजबूर हो जाती हैं।

4. सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल की कमी

कई महिलाओं के लिए कार्यस्थल तक सुरक्षित आवागमन, देर रात की ड्यूटी, कार्यस्थल पर भेदभाव या यौन उत्पीड़न का भय एक गंभीर चिंता का विषय बना रहता है।

यदि कार्यस्थल सुरक्षित, सम्मानजनक और समावेशी न हो, तो महिलाएँ अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य नहीं कर पातीं। प्रत्येक संस्था की जिम्मेदारी है कि वह स्पष्ट शिकायत निवारण व्यवस्था, लैंगिक संवेदनशीलता और सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करे।

आगे की राह

महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ाने के लिए केवल डे-केयर केंद्र खोलना पर्याप्त नहीं है। इसके साथ-साथ समान वेतन, निष्पक्ष पदोन्नति, लचीली कार्य नीतियाँ, सुरक्षित कार्यस्थल, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, नेतृत्व प्रशिक्षण तथा घरेलू जिम्मेदारियों में पुरुषों की समान भागीदारी भी आवश्यक है।

सरकार, उद्योग, शैक्षणिक संस्थानों और समाज को मिलकर ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो महिलाओं को केवल नौकरी करने का अवसर ही नहीं, बल्कि नेतृत्व करने और निर्णय लेने का समान अधिकार भी दें।

महिलाओं की आर्थिक भागीदारी केवल उनके व्यक्तिगत विकास का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह किसी भी देश की आर्थिक प्रगति और सामाजिक विकास का आधार है। यदि हम वास्तव में लैंगिक समानता स्थापित करना चाहते हैं, तो हमें चाइल्डकेयर से आगे बढ़कर उन सभी बाधाओं को दूर करना होगा जो महिलाओं की प्रतिभा, आत्मविश्वास और करियर की उड़ान को सीमित करती हैं।

जब महिलाओं को समान अवसर, सुरक्षित वातावरण, सम्मान और सहयोग मिलेगा, तभी वे अपनी पूरी क्षमता के साथ कार्य कर सकेंगी और समाज तथा राष्ट्र के विकास में और अधिक प्रभावी योगदान दे पाएँगी।

डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

https://youtu.be/nkntphH-GKE?si=BrSIIxZ5nxY77jNb