गोविंद सक्सेना से गोविंद गुलशन तक का सफ़र – विनम्र श्रद्धांजलि
गोविंद सक्सेना से गोविंद गुलशन तक का सफ़र – विनम्र श्रद्धांजलि
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घर के आगे नीली मारुति 800 रुकी और घर की डोर बैल बजी। दरवाज़ा मैंने खोला तो सामने एक महानुभाव हाथ में दीपावली की मिठाई का डिब्बा लिए खड़े थे।

मुझसे कहा, “दीपावली की शुभकामनाएँ। मैं गोविंद सक्सेना। क्या डॉक्टर साहब घर पर हैं?”
लगभग चार दशक पहले का ये दृश्य आज भी आँखों के सामने धुंधला नहीं हुआ है। ये गुलशन भाई साहब का घर पर पहला आगमन था। तब मैं इंटरमीडिएट का छात्र था।
मैंने तुरंत कहा, “ जी, आपको भी दीपावली की शुभकामनाएँ। पापाजी घर ही हैं । आपका स्वागत है।”
वो बोले, “डॉक्टर साहब मुझे नहीं जानते पर मैं उनकी रचनाओं को बहुत पसंद करता हूँ और उनसे मिलने का इच्छुक हूँ।”
इतने में पापाजी भी अपने कमरे में से बाहर आ गए और हम सब ड्राइंग रूम में आ गए। बातचीत में उन्होंने बताया कि वो इंश्योरेंस कंपनी में कार्यरत हैं और हमारी दूर की रिश्तेदारी में भी आते हैं। फिर सिलसिला शुरू हुआ उनसे मुलाक़ातों का।
मुझे याद है जब उन्होंने हमें अपने आवास (जो लाइन पार दुग्धेश्वर मंदिर के पास था) पर भोजन पर आमंत्रित किया और जब पापाजी से खाने में पसंदगी का पूछा तो ये जानकर अचंभित थे कि हमारा परिवार शाकाहारी है। लेकिन भाभीजी ने और स्वयं भाई साहब ने इतना स्वादिष्ट शाकाहारी भोजन बनाया जो स्वाद आज तक हमें याद है।
कुछ समय बाद पापाजी ने बताया कि गोविंद भाई साहब ख़ुद भी लिखने का शौक रखते हैं और “गुलशन” उपनाम से लिखते हैं। तब से गोविंद भाई साहब से वो हमारे गुलशन भाई साहब हो गए। उनकी शायरी की गहराई से कौन अछूता रहा है और अब तो उनकी उस्तादी में कितने ही नए शायरों ने अपनी पहचान बना ली है।
हमारा चिरंजीव विहार का घर गुलशन भाई साहब के घर से पिछली गली में था और जब तक हमने उस घर को बेचा नहीं था तब तक गुलशन भाई साहब ने ही उस घर की देखरेख भी की थी। आ० कृष्ण बिहारी नूर जी को अपना उस्ताद मान लेने के बाद गुलशन भाई साहब से पापाजी का एक अलग संबंध भी बन गया था।
समय बीतता गया और हमारे संबंध और मज़बूत होते गए। जब भी मैं भारत आया हर बार उनसे मुलाक़ातें होती रहीं। पापाजी और मम्मी को एक बार चिरंजीव विहार लेकर गया था तब कुछ चित्र अचानक ही मैंने ले लिए थे।
भावना के ताँका संग्रह “यादों का गाँव” के विमोचन समारोह में गुलशन भाई साहब से आखिरी मुलाक़ात रही ।
उनका यूँ अचानक जाना मन को झकझोर गया है। उनकी स्मृतियों का सैलाब ठहर ही नहीं रहा है। ![]()


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