“दोहा सप्तशती -१ : गागर में सागर”

“दोहा सप्तशती -१ : गागर में सागर”

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर।।

बच के रहना रे बाबा, बच के रहना रे! मैं खतरों का खिलाड़ी तो हूँ नहीं, तो मैंने भी सोचा भाग लेते हैं या रास्ता बदल लेते हैं। लेकिन, मैंने जब अपनी नज़र घुमाई, तो देखा कि आगे ‘जेन ओ’ (ओल्ड) यानी कि मध्य युग के सतसईया लोग अपनी-अपनी पोथियों के साथ घेरा डाले हुए हैं और जोर-जोर से नारा लगा रहे हैं –

“जो न पढ़ा सतसईया, कवि नहीं, वह है गवैया!”

सभी के हाथों में बैनर की जगह है – तुलसी सतसई, बिहारी सतसई, रसनिधि सतसई, मतिराम सतसई, वृंद सतसई, भूपति सतसई, चंदन सतसई, विक्रम सतसई, राम सतसई!

कोई बात नहीं, ट्रेनिंग में यह भी तो बताते हैं कि कहीं जाने के पहले, भागने का रास्ता भी ढूँढ कर जाना चाहिए। सो, मैंने पीछे झाँका! रास्ता बंद! ‘जेन एन’ (न्यू) यानी कि आधुनिक काल के हरिऔध, वियोगी हरि जैसी हस्तियाँ! उनके हाथों में हरिऔध सतसई, वीर सतसई …….! वे भी जोर-जोर से नारा लगा रहे हैं –

“जो न गढ़ा सतसईया, कवि नहीं, वह है भैया!”

अब ऊपर तो जा नहीं सकता था क्योंकि पंख दिया नहीं ब्रह्मा ने! एक ही रास्ता बचा था – नाटा तो हूँ ही, झुककर-छुपकर उनके बड़े-बड़े बैनरों की ओट लेकर निकल जाता हूँ। शायद किस्मत साथ देने को तैयार नहीं थी। झुका तो भी फँसा – डॉ. विनय कुमार सिंघल ‘निश्छल’ जी ने पकड़ लिया। निश्छल – छल या कपट से रहित, लेकिन उनकी दीर्घ दृष्टि और पूर्वानुभव कृष्ण से कम नहीं! पकड़ा गया, सभा में लाया गया और दोष साबित हो गया। दिग्गज वकील महोदय की दलीलों से सजा मिली – “मैं रणछोड़ दास उनकी पुस्तक ‘दोहा सप्तशती -१’ पर लिखूँ अपने विचार !”

मैं शृंगार, माधुर्य, वीर रसों की वाटिका में न जाकर, न भटककर, अपनी बालकनी की छोटी-सी फुलवाड़ी में डॉ. विनय कुमार सिंघल जी के दोहों को कुछ इस तरह बिखड़ाया और सजाया कि मैं उन्हें आसानी से अपनी पसंद के अनुसार सजा सकूँ। इसलिए, मेरी बगिया में इनके दोहों की वह सीमित छटा ही छाई जिन्हें मैं पसंद करता हूँ।

एक वाक्य में कह सकते हैं – ‘दोहा सप्तसती -१’ ‘गागर में सागर’ है! और, इस सागर के गागर में हैं – जैविक संसाधन – मछलियाँ, सी-फूड, समुद्री शैवाल; खनिज और ऊर्जा संसाधन – पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस, पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स; बहुमूल्य और सजावटी वस्तुएं – मोती, शंख, सीपियां, मूंगा और सर्वोपरि जीवनदायिनी नमक! अब यह समझ में नहीं आता है कि किस मोड़ से शुरू करें। लेकिन, करना तो है, तभी तो बढ़ेंगे।

तो सबसे पहले जरुरी है, दोहाकार की छुपी-छुपाई मनोस्थिति को समझा जाए, न कि उनकी रचना में श्रृंगार, भक्ति, नीति, मिलन-बिछोह, उल्लास-विषाद, कल्पना शक्ति, अलंकार आदि का विश्लेषण!

सिंघल जी ने अपने ‘उपोद्धात’ में छुपी-छुपाई मनोस्थिति – सच का बयाँ किया है – दोहाकार भाई नरेश शांडिल्य से मार्गदर्शन, डॉ वीणा शंकर शर्मा ‘चित्रलेखा’ के साथ साझा दोहा संकलन की सम्भावना और विघ्न, और अंत में “७०९ (जबकि पुस्तक में कुल संख्या ७१२ दिखती है) का संकलन ‘विनय सप्तशती’ के रूप में हमारे समक्ष पेश करने का सफल प्रयास, जबकि पुस्तक का नाम जो छपा है, वह है – “दोहा सप्तशती – १!” शायद यह बाद में निर्णय बदला हो। मेरे ख्याल से “विनय सप्तशती” बेहतर होता क्योंकि जब तुलसी सतसई, बिहारी सतसई, रसनिधि सतसई, मतिराम सतसई, वृंद सतसई, भूपति सतसई, चंदन सतसई, विक्रम सतसई, राम सतसई कह सकते हैं, तो “विनय सप्तशती” से भी रचनाकार का नाम स्पष्ट हो जाता और वह भी प्रथम पृष्ठ पर ही!

दूसरी बात, पुस्तक पर ‘भाग -१’ क्यों लिखा है? लगा दिया फ़ोन सिंघल जी को यह पूछने कि दूसरे भाग की प्रति नहीं मिली है। मिले तब, जब छपेगी। परन्तु, “सिर्फ भाग – २ नहीं, संभवतः भाग – ३ और भाग – ४ तक जाए” – उन्होंने छूटते ही बताया। अयें, इसका मतलब यह हुआ कि सतसई-संसार के एकमात्र “बहु-सतसईकार”! मुबारक हो डॉ विनय कुमार सिंघल जी!

शुरुआत ही हुई है एक तीर से कई शिकार की – भक्ति, अध्यात्म, मिलान, बिछोह, अनुप्रास का संयोजन है एक ही दोहे में –

मोहे मोहन मोद में, मोरी मत मदराय,
मारी-मारी मैं फिरूँ, मनमोहन मुस्काय! (दोहा १)

इनके दोहों को शुरू से अंत तक एक साथ पढ़ना और याद रखना असंभव है। बिखरे हुए मोतियों की छटा कम नहीं होती, फिर भी मोतियों को छाँटकर एक माला पिरोना भी कम प्रयासकर नहीं होता है। इन मोतियों से छोटी-छोटी कुछ मालायें बनाने का प्रयास किया है, जो नीचे देखी जा सकती हैं आपके द्वारा, आपकी पसंद के अनुसार!

इनके दोहों में कितने हैं भक्ति के, गिनती मुश्किल है यानी कि इन्होंने भी ‘जेन ओ’ का पथ अपनाया है और स्वीकारा भी है-

कहता चल तू दोहरे, नित न्यारे अभिराम,
प्रभु जानें तेरी व्यथा, भली करें प्रभु राम! (दोहा -३७)

और क्यों लिखें और पढ़ें दोहे, उन्होंने समझाया भी है। उन्हीं के शब्दों में –

दोहों की दुनिया बड़ी, होती रोचक मीत,
करती सारे ताप का, शमन रोपती शीत! (दोहा -७०४)

इसी तरह नीति पर भी दोहों की संख्या अनगिनत है –

प्राणी हत्या पाप है, बनो निरामिष तात,
तू बचने न पायेगा, तड़पेगा तव गात! (दोहा – ३६)

ऐसा नहीं कि इन्होंने सिर्फ पुराने लीक पर ही दोहे गढ़े हैं, वरन् इनके दोहों की भीड़ में घर, परिवार, सांसारिक जुड़ाव के भी उदहारण मिलते हैं –

महके महुआ लाडला, जुगबु से गलहार,
फागुन की मस्ती भरे, पानी में अंगार! (दोहा -३९)

घर-परिवार से आगे बढ़कर उन्होंने जल की महत्ता, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विसंगतियों, हास्य, व्यक्ति विशेष, हिंदी, योग, क्रोध, माँ, नेता, बच्चों, प्रेम और प्रिया, धन, न्यायपालिका, विदेश आदि जीवन के अनगिनत क्षेत्रों पर दोहामय लेखनी चलायी है।

केंद्र और राज्य सरकारों की संस्थाओं की ही नहीं, सारे विश्व में आज जल संरक्षण की माँग है जिसके बारे में न कबीर ने ‘क’ लिखा और न बिहारी लाल ने ‘ब’; लेकिन अगर ‘अब’ वे होते तो जरूर लिखते! वो, कमी पूरी कर दी है विनय सिंघल जी ने –

कल की कल, जल में छिपी, जल जीवन आधार,
बूँद बूँद पीयूष है, जल का कर सत्कार! (दोहा – ३८)

सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक विसंगतियों पर ‘जेन ओ’ (ओल्ड) ने लिखा और ‘जेन एन’ (न्यू) ने भी। यानी कि यह एक लेखन-धर्म है जो युग-युगांतर से चला आ रहा है और डॉ. सिंघल जी धर्म विमुख नहीं हुए। तो, बानगी देखें सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक सामाजिक विसंगतियों की –

मैं तो समझा था प्रिये, जीवन भर का साथ,
मुझे छोड़ तुम जा बसे, परदेसी के साथ! (दोहा – १५४)

चोर, चोरनी ला रहे, नाम बदल कर चोर,
कैसे आएगी भला, घर में पावन भोर! (दोहा – १६)

कर्मकांड में डूब कर, मत कर तू पाखंड,
दुखियों के आँसू मिटा, उठा नेक को दंड! (दोहा – १४२)

फिर, हास्य तो ऐसा है कि आप कबीर की पंक्तियों को याद कर सकते हैं, “कांकड़ पाथर छोड़कर मस्जिद लियो बनाये, ता चढ़े मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाए” और “पाथर पूजे हरि मिलै, तो मैं पूजूँ पहाड़!” इन सबसे बढ़कर ‘जेन जी’ पर हास्य देखें जिनपर आप हँसे बिना रह ही नहीं सकते –

कुत्ते जैसा हो गया, तू भी मेरे यार,
शौच कराता फिर रहा, तू कुत्ते को यार! (दोहा – १००)

डॉ सिंघल जी आधुनिक काल के हस्ताक्षर हैं, तो इनकी कलम ने आज के नए पर्व त्योहारों पर लेखनी चलाई और वो भी सच को बयाँ करती हुई। हिंदी पर कुछ ऐसे हैं तीखे तीर –

हिंदी दिवस मना रहे, कुछ कवियों की ठाट,
सरकारी पैसा मिले, होती बंदरबाँट! (दोहा – १४६)

हिंदी हिंदी हो रहा, चहुँदिक हिंदी गगन,
फिर सो जायेंगे सभी, ताज हिंदी का मान! (दोहा – १४७)

आधुनिक उत्सवों में एक और नाम है – ‘योग दिवस!’ ११ दिसंबर २०१४ में संयुक्त राष्ट्र संगठन-द्वारा २१ जून को ‘योग दिवस’ के रूप में अपनाये जाने के बाद, यह हर वर्ष पर्व-त्योहारों की तरह सारी दुनिया में मनाया जाता है। आयुष मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय-द्वारा योग और स्वस्थ जीवन-शैली को बढ़ावा देने के लिए कई लोकप्रिय नारे दिए गए हैं – “योग करें, निरोग रहें!” तो, ऐसे में योगी मन मचल उठा। देखें बानगी जिनमें योग के साथ-साथ भक्ति भी शामिल है-

भोग विनाशक होत है, रोग भोग का प्राण,
योग अगर अपनाये लो, रोग होय निष्प्राण! (दोहा – ५)

भोग से अपना मन हटा, योगी बन के माँग,
माँ ही फिर देगी तुझे, रोगमुक्ति का राग! (दोहा – ३२२)

माँ की महत्ता संस्कृत के इस श्लोक में देखी जा सकती है –

नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः।
नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥

और, इसी महत्ता को दोहे में कहा है डॉ. सिंघल जी ने –

मूरख माँ पर कर सदा, आँख मूँद विश्वास,
सारे दुःख वो मेट कर, देती सुःख की साँस! (दोहा – ३९२)

तूने जाना ही नहीं, माँ का नेह विधान,
न्याय उसी के हाथ में, यह भी तू ले जान! (दोहा – ३९३)

बच्चों के लिए भी कई शिक्षाप्रद दोहे हैं जिनमें से एक दोहा जो हर पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण है और खास तौर पर आज की जनरेशन के लिए, उद्धरणीय है –

तू बच्चों के दोष पर, पर्दा कभी न डाल,
बच्चे हैं कच्चे घड़े, चाहे जैसा ढाल ! (दोहा -४६८)

प्रेम और प्रिया परिवार का आधार है, तो इन्हें कैसे छोड़ सकते थे हमारे दोहाकार डॉ. सिंघल जी। कई दोहे पठनीय हैं – ५३३, ५३४, ५३५, ५३६, ६१६ ! एक ओर प्रेम का उद्गार है –

मेरी आहों से प्रिये, होता उल्कापात,
मैं पीड़ित चिरकाल से, करो न मुझ पर घात! (दोहा – ६१६)

चलो प्रिये छत पर चलें, निकला छत पर चाँद,
चलो सुधा पी लें अभी, सीमाओं को लाँघ!! (दोहा – ५३६)

तो दूसरी ओर आज की नवयौवनाओं की आँख मिचौनी के खेल का भी जिक्र है –

मैं तो समझा था प्रिये, जीवन भर का साथ,
मुझे छोड़ तुम जा बसे, परदेसी के साथ!

परिवार के बाद आता है दोस्तों का साथ! दोस्तों को प्यार से गाली देकर ही बुलाते हैं न हमसब ! और आज जब दोस्त दोस्त न रहा, तो ऐसे में दोस्त पर गुस्सा नाजायज़ नहीं कह सकते। शायद, निश्छल सिंघल जी से किसी दोस्त ने दुश्मनी ठानी होगी, तभी तो कवि को क्रोध करने का पूरा अधिकार है और व्यक्त करने का भी। हाँ, उनका तरीका अनोखा हो सकता है –

गिन गिन कर मैं थक गया, तेरी गाली यार,
अगली गाली पर करूँ, मैं तेरा संहार! (दोहा – ३३२)

परिवार, मित्रों और समाज में बने रहने के लिए क्या सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, हमारे महर्षियों ने बहुत पहले ही कह रखा है – “वित्तम् सर्वं”! इन्होंने भी वित्त यानी कि धन की चर्चा कई दोहों में की है जिनमें द्रस्टव्य हैं – ५३२, ५८०, …. –

धन ना जाता साथ में, सच्ची है यह बात,
लेकिन प्यारे धन बिना, बिगड़े बनती बात ! (दोहा – ५३२)

अगर कविवर की पुस्तक “दोहा सप्तशती -१” में संकलित दोहों को सिर्फ अपने पूर्ववर्ती दोहाकारों के दोहों पर निर्णय करें, तो यह इनकी पुस्तक के साथ अन्याय होगा क्योंकि हिंदी की कहावत/पंक्ति है –

“लीक-लीक गाड़ी चलै, लीकहि चले कपूत।
लीक छाड़ि तीनों चलें, शायर सिंह सपूत।।”

तो इन सपूत कविवर सिंघल जी के दोहों की विशेषता का निर्णय उनकी आज की घटनाओं पर पकड़, उन्हें व्यक्त करने और कुछ अनूठा कर/लिख जाने के मापदंड पर भी देखनी होगी। लीक छोड़कर चल तो पड़े, लेकिन क्या-क्या मिला लीक से हटकर और क्या वह ताज्जुब करने लायक है? हाँ, है। सुनिए एक-एक कर।

आपने कोई दोहा सुना-पढ़ा है नेता के ऊपर? नहीं न ! तो, पढ़िए और सुनिये-

साधू बनकर एक दिन, देवें गीता ज्ञान,
पाँच वर्ष जी भर करें, जनता का अपमान ! (दोहा – ६२१)

नेता नेता एक हैं, लूट रहे सब माल,
दुष्ट बने सिरमौर हैं, जनता है बेहाल ! (दोहा – ४३३)

नेता से राजनीतिक पार्टियां बनीं और इन्होंने दोहा गढ़ा –

कांग्रेस रचित जिंजरी , सबने देखा खेल,
देश लूट कर खा गई, घोटालों में पेल ! (दोहा – ६१८)

फिर विभिन्न पार्टियों के नेता-विशेष पर भी लिख डाला। कुछ पेश हैं –

भारत के इतिहास के, शिखर महान पटेल,
जो कलंक को पूजते, सारे विष की बेल ! (दोहा – १७५)

मोदी के गुणगान पर, क्यों है हाहाकार,
सब हिन्दू के बीज हैं, हम भी वे भी यार ! (दोहा – ६१५)

लाल बहादुर ने किया, नायक बनकर काम,
सबके दिल में बस गये, पूजता उनका नाम ! (दोहा – ४३४ )

व्यक्ति विशेष पर लिखे दोहों को पढ़ते-पढ़ते एक दोहा मिला जिसे समझ सकें, तो समझें या फिर कविवर से पूछें। पहले सुनें दोहा –

तुम्हें मिली बिहार की, भेंटें नाना रूप,
प्रीत, सुनीता, कामिनी, लावण्या सी धूप! (दोहा – १७८)

इस सम्बन्ध में मैं बता दूँ कि एक बार कविवर ने बताया था कि उन्हें बिहारियों से बहुत संपर्क रहा है और बहुत दिनों से। उन्होंने कुछ नाम भी बताये थे, लेकिन अब मुझे स्मरण नहीं है। परन्तु, ऊपर वाली पहेली का जवाब मुझे मालूम है। सुनिए – यह दोहा उन्होंने श्री विनोद श्रीवास्तव, एडवोकेट के लिए लिखा था। प्रीत, सुनीता, कामिनी तीनों वक़ील हैं बिहार से और लावण्या जी श्री विनोद श्रीवास्तव की पत्नी! लावण्या जी सेवानिवृत्त अध्यापिका हैं! प्रीत, सुनीता, कामिनी बिहार की विभूतियाँ हैं जिन्होंने कवि के निर्देशन में वकालत के क्षेत्र में काम शुरू किया और आज स्थापित हैं इस क्षेत्र में!

हम सब अखबार जरूर पढ़ते हैं। अगर आप का जवाब ‘न’ है, तो आप टी. वी. जरूर देखते होंगे। अगर इसका जवाब भी ‘न’ है, तो आप मल्टीमीडिया के दीवाने-परवाने हैं ! हैं न ! हर क्षण ऊँगली चलती रहती है स्क्रीन स्क्रॉल करने के लिए! फिर आप इस बात पर भी ‘न’ नहीं कह पायेंगे कि आपने नहीं देखी- पढ़ी है – आजकल के अख़बारों में एक अनोखी खबर आने लगी है – न्यायपालिका पर ऊँगली उठने लगी है। और, डॉक्टर विनय कुमार सिंघल निश्छल जी जो पेशे से प्रसिद्ध काबिल विधिक व्यवसायी अधिवक्ता रहे हैं, नज़र बंद नहीं कर सकते हैं। हाँ, उन्होंने हालात को कलमबंद कर लिया है अपने दोहों ५४५, ५४६ में –

अकूत धन अब मिल रहा, न्यायमूर्ति के गेह,
कलियुग भी लज्जित हुआ, लख निर्लज्ज सदेह ! (दोहा – ५४६)

पता नहीं कविवर विदेश गए या नहीं, परन्तु शायद इन्होंने विदेशों के बारे में अच्छी जानकारी हासिल कर दोहों में हमें समझा रहे हैं –

इजराइल की फ़ौज भी, सजग रहे हर याम,
भरे पड़े हैं वीर भट्ट, घर-घर उसका धाम ! (दोहा – ६२०)

गीतकारों ने शोक गीत लिखा है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी पुत्री पर एक लंबी कविता ‘सरोज-स्मृति’ लिखी है जो हिंदी साहित्य का श्रेष्ठतम और अत्यंत मर्मस्पर्शी शोक-गीत है-

ऊनविंश पर जो प्रथम चरण
तेरा वह जीवन-सिंधु-तरण;
तनय, ली कर दृक्-पात तरुण
जनक से जन्म की विदा अरुण!

आश्चर्य तो तब हुआ जब इनके दोहों में व्यक्तिगत शोक सन्देश नज़र आ गए जो पूर्ववर्ती दोहों में नहीं मिलते। अनूठा प्रयोग है –

विजय गुप्त जी को समर्पित:
जो आया वह कर गया, अपना अपना काम,
शेष यही है कामना, पाए प्रभु का धाम! (दोहा – १७२)

तो ऐसा न समझ लें कि सिंघल जी ने सच की खोज नहीं की है। पूर्णतः पॉजिटिव थिंकर हैं। रावण में भी अच्छाइयाँ हैं। बस आप ढूँढ सकें, तो ढूँढ़ लें –

आओ हम फिर से लिखें, सच की गाथा आज,
रावण की अच्छाइयाँ, बने मनुज का ताज ! (दोहा – ४३०)

अंतिम दोहा ७१२ तो पूर्ण आशावादी है! हैप्पी इंडिंग!

दीवाली भी आ गयी, लेकर एक उजास,
जाना उस घर, तम जहाँ, करता हो अधिवास ! (दोहा -७१२)

सवाल अगर जेहन से निकले नहीं, तो जवाब कहाँ से आयेगा? तो, आज जेहन से उछलकर सवाल बाहर आ गया जब डॉक्टर साहेब का फ़ोन आया – “दोहों को आपने दो की जगह चार पंक्तियों में क्यों कर दिया है?” जवाब भी सटीक था और पाठकों की सुविधा के लिए – “पाठक को पता चल सके कि कहाँ पर किस विषय वास्तु पर जोड़ देना है।” यानी कि सत्य की सर्जरी करने की जरुरत न पड़े!

इतनी मेहनत से ७१२ दोहे पढ़े हैं, तो मेरा ज्ञान भी कुछ बढ़ गया है! खोजी प्रवृत्ति जागृत हो गयी! कविवर की कृपा है! कविवर की कृपादृष्टि से मैं कुछ अनछुये और छिपे पहलूओं पर लिख पा रहा हूँ। “अधजल गगरी छलकत जाये”-जैसी मेरी स्थिति हो गयी है। मेरी गगरी भी छलक पड़ी है, तो कुछ अपने मन की लिख डालता हूँ।

पुस्तक पढ़ने के दौरान मुझे लगा कि कुछ दोहे संभवतः रिपीट हो गए हैं जिनपर आगे आनेवाली पुस्तकों में ध्यान देकर ठीक करना पड़ेगा। दूसरी बात, विभिन्न विषयों पर लिखे दोहे हैं, तो मेरी दृष्टि में यह अच्छा होता कि इन्हें कैटेगराइज कर प्रस्तुत किया जाता ताकि इनपर शोध के वक़्त शोधकर्ता को सुविधा होती।

उम्मीद है कि “न भूतो न भविष्यति” वाली चार भागों में प्रकाशन होने वाले लगभग तीन हज़ार दोहे वर्गीकृत (categorized) रूप में हमारे समक्ष आयेंगे और ट्रेडिशनल दोहों के साथ-साथ न्यायपालिका, शोक सन्देश वाले दोहों-जैसे जीवन के कई अन्य अनछुए पहलूओं पर भी दोहाकार के दोहे हमें पढ़ने को मिलेंगे। संभवतः कुछ और नए क्षेत्र भी होंगे – जेन जी, जेन अल्फा (Generation Alpha), जेन बीटा (Generation Beta), एस आई आर २०२६ (Special Intensive Revision 2026), वैश्विक संघर्ष और भू-राजनीति, खराब मौसम और बाढ़, प्रकृति से छेड़छाड़ और उसका परिणाम, सड़क दुर्घटनायें और मौत, इमारत जलने एवं गिरने की दुखद घटनायें इत्यादि!

कविवर डॉ विनय कुमार सिंघल निश्छल जी से बस यही कहना है उनके तीन हज़ार दोहों के लिए – “हम इंतज़ार करेंगे क़यामत का, खुदा करे कि क़यामत हो और इनके दोहे आयें!” अल्लामा इक़बाल की तरह होगा हम सब दोहा प्रेमियों का इंतज़ार –

“माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं,
तू मेरा शौक़ देख मेरा इंतज़ार देख !”

शंभु अमिताभ
नई दिल्ली
८ सितम्बर २०२६
रात्रि २३:२७