“एक दोस्ती ऐसी भी- Rashmi Sinha

सुबह की भाग-दौड़ अब जाकर दस बजे ख़त्म हुई। बेटा बहू आफ़िस और बच्चे स्कूल के लिए निकल गए।अब प्रीति को अपने लिए समय मिला।एक कप चाय और न्यूज़ पेपर लेकर प्रीति इत्मीनान से बालकनी में बैठ गयी।दो-चार घूँट पिया ही था कि फ़ोन की घंटी बजने लगी।इस वक़्त किसका फ़ोन आ गया,अभी तो चैन से बैठी हूँ ।मोबाइल के ज़माने में लैण्डलाइन पर किसका फ़ोन आ गया….सोचती हुई प्रीति कुछ झल्लाहट के साथ ड्रॉइंगरूम में जाकर फ़ोन उठाया।हैलो कौन?गौरव और गरिमा आफ़िस जा चुके हैं आप शाम को फ़ोन कीजिएगा।एक साँस में प्रीति बोल गयी।तभी दूसरी तरफ़ से आवाज़ आयी तू प्रीति ही बोल रही है न, मैं तेरी पक्की सहेली शालू।इतना सुनते ही दोनों तरफ़ हँसी ठहाकों का दौर शुरू हो गया।कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूँ और घन्टों बातें होती रहीं।शालू ने बताया बड़ी मुश्किल से तेरे बेटे का ये फ़ोन नम्बर मिला।तेरा पहले वाला मोबाइल आउट आफ सर्विस बता रहा था।प्रीति ने बताया कि पहले वाला मोबाइल ख़राब हो गया तब फ़ोन के साथ-साथ सिम भी बदलना पड़ा।फिर से फ़ोन करने का वादा के साथ फ़ोन डिस्कनेक्ट करके प्रीति फिर से बालकनी में आकर बैठ गयी।नज़रें न्यूज़ पेपर पर थी पर दिल बड़ा खुश था।इतने दिनों बाद फिर से पक्की सहेली मिल गयी थी।न्यूज़ पेपर के पन्नों के साथ ही प्रीति अतीत के पन्नों को पलटने लगी।


जब-तक पति थे प्रीति मुज़फ़्फ़रपुर में अपने पुश्तैनी मकान में बहुत ही सुखी जीवन व्यतीत कर रही थी।पति-पत्नी की नोक-झोंक मान-मनुहार के साथ ज़िंदगी की गाड़ी प्यार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी चल रही थी।प्रीति के ससुराल के घर से दो घर के बाद उसकी पक्की सहेली शालू का ससुराल था।दोनों सहेली नर्सरी से मैट्रिक तक एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ी।कालेज में भी बी ए तक दोनों का साथ बना रहा।दोनों हमेशा साथ-साथ रहती गप्पें मारती शापिंग करती।एक-दूसरे के घर में सबसे घुल मिल कर रहती और बराबर का प्यार पातीं।


बी ए करने के बाद दोनों की शादी हो गई।संजोग ऐसा रहा दो दिन के आगे-पीछे दोनों सहेली की शादी हुई और ससुराल भी एक ही मुहल्ले में दो घर बाद मिला अब तो दोनों की दोस्ती एक मज़बूत बन्धन में बँध चुकी थी।समय बीतता गया दोनों दो-दो बच्चों की माँ बन गयी।समय पंख लगाकर उड़ता रहा और आज दोनों के बच्चों की शादी भी हो गयी।शालू का बेटा इंजीनियरिंग करके अमेरिका में नौकरी करने लगा और बेटी अपने इंजीनियर पति के साथ बैंगलोर में सैटल कर गयी।प्रीति का बेटा भी एम बी ए करके मल्टीनेशनल कम्पनी में नौकरी करने लगा और बेटी मुंबई में अपने पति के साथ रहते हुए एक स्कूल में शिक्षका के पद पर काम करने लगी।


अब दोनों सहेली बच्चों के जाने के बाद अकेलेपन को दूर करने के लिए रोज़ शाम को पति- पत्नी एक-दूसरे के घर आते और चाय पीते-पीते खुब गप्पें करते।इसी तरह हँसी-ख़ुशी दिन गुजरने लगे। एक रात प्रीति के पति को हार्ट अटैक हुआ और अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही उन्होंने संसार को अलविदा कह दिया।बेटा बहू बेटी दामाद सब आये। तेरहवीं के बाद बेटा प्रीति को लेकर पूना चला गया।शालू से फ़ोन पर बातें होती रहीं फिर धीरे-धीरे यह सिलसिला कम होता गया,दूरियाँ बढ़ती गई।बस कभी-कभी किसी से एक-दूसरे का हाल मिलता रहा।एक दिन प्रीति को मुज़फ़्फ़रपुर में रहने वाले देवर से पता चला कि शालू और उसके पति का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण बेटी के पास बैंगलोर शिफ़्ट हो गये हैं ।


और आज इतने दिनों बाद शालू का फ़ोन आया,शालू से बातें करके प्रीति के चेहरे पर मुस्कान छा गयी।कुछ खोकर कुछ पाने की ख़ुशी की चमक आँखों में दिखने लगी।अब तो हर दूसरे दिन फ़ोन पर बातें होती,पर दोनों सहेली का सिर्फ़ बातों से मन नहीं भरता।दोनों के दिल में मिलने की चाह प्रबल होती जा रही थी।परन्तु दोनों का पूने बैंगलोर आना-जाना मुश्किल था।साथ-साथ चाय पीना और घन्टो गप्पें मारना अब संभव नहीं था।लेकिन जहाँ चाह वहाँ राह है।आधुनिक तकनीक ने दोनों सहेली को मिला दिया ।अब दोनों विडियो काल करती अपनी-अपनी चाय लेकर बैठ जातीं और चाय पीते-पीते अतीत को याद करतीं साथ ही घन्टाों दुनिया जहान की बातें करती।ऐसा अहसास उन्हें होता कि दोनों पास-पास बैठकर चाय पी रहीं हैं और बुढ़ापे में बचपन को जी रहीं हैं ।

रश्मि सिन्हा
राँची