5121 कविताओं की ‘माँ की ममता’ से 5000 से अधिक कवियों तक
5121 कविताओं की ‘माँ की ममता’ से 5000 से अधिक कवियों तक
हिंदी भाषा के विकास और साहित्यिक चेतना को नई दिशा दे रहे सी.ए. शंकर अंदानी
दिल्ली। हिंदी भाषा केवल शब्दों और व्याकरण का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय समाज की संवेदना, संस्कृति और भावनात्मक एकता की सशक्त अभिव्यक्ति है। हिंदी को समृद्ध बनाने में जहां साहित्यकारों की रचनात्मक भूमिका महत्वपूर्ण है, वहीं नए रचनाकारों को मंच देना भी उतना ही आवश्यक है। इसी दिशा में सी.ए. प्रो. डॉ. शंकर घनश्यामदास अंदानी साहित्य-सृजन के साथ हिंदी रचनाकारों को जोड़ने और उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर देने के क्षेत्र में सक्रिय दिखाई देते हैं।

सी.ए. शंकर अंदानी की साहित्यिक यात्रा का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उनका व्यापक लेखन है। उनके द्वारा अब तक 116 हिंदी पुस्तकों के लेखन एवं प्रकाशन का उल्लेख किया गया है। उनकी रचनाओं में मां की ममता, परिवार, माता-पिता, नारी सम्मान, सामाजिक सरोकार, राष्ट्रप्रेम, शिक्षा, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं जैसे विषय प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनके साहित्य में भावनात्मक अभिव्यक्ति के साथ समाज को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास भी दिखाई देता है।
‘माँ की ममता’ बना साहित्यिक संकल्प
उनकी साहित्यिक गतिविधियों में ‘माँ की ममता’ 5121 कविता संग्रह परियोजना विशेष आकर्षण का केंद्र है। मां के प्रेम, त्याग, वात्सल्य और समर्पण को केंद्र में रखकर 5121 कविताओं का यह व्यापक साहित्यिक संकल्प मातृत्व की सार्वभौमिक भावना को साहित्य से जोड़ने का प्रयास है। मां किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि समूची मानवता की भावनात्मक धुरी है। इसलिए ‘माँ की ममता’ जैसे विषय को हजारों कविताओं के माध्यम से अभिव्यक्त करना हिंदी साहित्य में व्यापक जनभागीदारी की अवधारणा को सामने लाता है।
5000 से अधिक कवियों को हिंदी मंच
हिंदी के विकास की असली ताकत केवल स्थापित साहित्यकारों में नहीं, बल्कि उन हजारों नए रचनाकारों में भी है, जो अपनी बात समाज तक पहुंचाना चाहते हैं। सीता ट्रस्ट एवं हिंदी मंच के माध्यम से देशभर के 5000 से अधिक कवियों को साहित्यिक मंच से जोड़ने की पहल इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
किसी भी भाषा का साहित्य तभी व्यापक बनता है, जब उसमें समाज के विभिन्न वर्गों, क्षेत्रों और पीढ़ियों की आवाज शामिल हो। कवियों को मंच उपलब्ध कराने से उन्हें अपनी रचनात्मक प्रतिभा प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है और हिंदी की साहित्यिक दुनिया में नए विचारों एवं नए स्वर जुड़ते हैं।
पुस्तक से डिजिटल मंच तक हिंदी का विस्तार
आज हिंदी के सामने सबसे बड़ी संभावनाओं में से एक डिजिटल दुनिया है। इंटरनेट, सोशल मीडिया, ऑनलाइन साहित्यिक मंच और डिजिटल प्रकाशन ने हिंदी को देश की भौगोलिक सीमाओं से आगे पहुंचाने का अवसर दिया है। ऐसे समय में साहित्यकारों और कवियों को एक मंच पर लाने के प्रयास हिंदी के प्रचार-प्रसार को नई गति दे सकते हैं।
सी.ए. शंकर अंदानी की साहित्यिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि वे व्यक्तिगत लेखन के साथ सामूहिक साहित्यिक सहभागिता को भी महत्व देते हैं। 116 पुस्तकों का लेखन और 5000 से अधिक कवियों को मंच से जोड़ने की पहल हिंदी साहित्य के विस्तार की इसी सोच को रेखांकित करती है।
साहित्य के साथ सामाजिक सरोकार
शंकर अंदानी की पहचान केवल लेखक के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में भी सामने आती है। उनके लेखन में समाज, परिवार, नारी, शिक्षा और मानवीय मूल्यों से जुड़े विषयों की उपस्थिति साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़ती है।
आज जब नई पीढ़ी डिजिटल माध्यमों से तेजी से जुड़ रही है, तब हिंदी साहित्य को भी आधुनिक माध्यमों के साथ आगे बढ़ाना समय की मांग है। हिंदी में नए विषयों पर लेखन, युवाओं की सहभागिता, ऑनलाइन साहित्यिक मंच और देश के विभिन्न हिस्सों के रचनाकारों के बीच संवाद—ये सभी भाषा के भविष्य को मजबूत करने वाले महत्वपूर्ण कदम हैं।
हिंदी के भविष्य के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी
हिंदी के विकास की जिम्मेदारी केवल सरकार या शिक्षण संस्थाओं की नहीं है। लेखक, कवि, शिक्षक, साहित्यिक संस्थाएं और पाठक—सभी मिलकर भाषा को जीवंत और समृद्ध बनाते हैं। सरकारी नीतियां हिंदी को संस्थागत आधार दे सकती हैं, लेकिन भाषा को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य साहित्यकार और समाज करते हैं।
इसी संदर्भ में सी.ए. शंकर अंदानी की साहित्यिक गतिविधियां उल्लेखनीय हैं। ‘माँ की ममता’ के 5121 कविताओं के साहित्यिक संकल्प, 116 हिंदी पुस्तकों के लेखन तथा सीता ट्रस्ट के हिंदी मंच से 5000 से अधिक कवियों को जोड़ने की पहल उनके हिंदी-प्रेम और साहित्यिक सक्रियता को रेखांकित करती है।
हिंदी का भविष्य तभी और अधिक उज्ज्वल होगा, जब भाषा केवल बोलचाल और पाठ्यक्रम की सीमा में न रहकर सृजन, संवाद, रोजगार, तकनीक और सामाजिक परिवर्तन की भाषा बने। नए रचनाकारों को मंच, साहित्य को व्यापक पाठक वर्ग और हिंदी को आधुनिक माध्यमों से जोड़ने वाले प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सी.ए. शंकर अंदानी का साहित्यिक सफर इसी व्यापक सोच की ओर संकेत करता है—स्वयं लिखना और दूसरों को लिखने का अवसर देना। यही दृष्टिकोण हिंदी साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और हिंदी भाषा को अधिक समृद्ध, व्यापक तथा जनसरोकारों से जुड़ी भाषा बनाने की दिशा में प्रभावी योगदान बन सकता है।
आचार्य सी ए.,प्रा.,डॉ. शंकर घनशामदास अंदानी
अहिल्या नगर
