जन जन की भाषा हिंदी

जन जन की भाषा हिंदी
डॉ मीतू सिन्हा, धनबाद

हिंदी अर्थात व्यंजन की भाषा, हर मन की भाषा! भाषा को परिभाषित करती हुई हिंदी आज के समय में मात्र आपसी संवाद के लिए ही नहीं, सांस्कृतिक पहचान और रोजगार के लिए भी एक सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। आज के समय में लगभग 60 करोड लोगों के संवाद का माध्यम बनी हुई इस भाषा की प्रासंगिकता के विषय में सोचना ही प्रासंगिक है।


एक समृद्ध इतिहास की थाती लिए हुए हिंदी भाषा हमारे भारत देश की ही पुत्री है जो उसका मान सम्मान बनाए रखने का बीड़ा उठाए हुए हैं। आज हिंदी की प्रासंगिकता संवाद के माध्यम, मनोरंजन, संवैधानिक स्थान, डिजिटल ज्ञान, पौराणिक इतिहास, वैश्विक विस्तार, शिक्षा के आधार और हमारी सांस्कृतिक पहचान के कारण है।


कोई भी जीव अपने जन्म के साथ ही अपने भावों के अभिव्यक्ति का माध्यम ढूंढता है। इन सभी जीवो का सिरमौर होने के कारण मनुष्य में भी इस प्रवृत्ति का होना स्वाभाविक ही है। मानव अपने सृजन से ही अभिव्यक्ति का कोई ना कोई माध्यम ढूंढता रहा है। जब मानव का विकास हो रहा था, तब वह भाषा के अभाव में संकेत में बातें करते थे परंतु भाषा के आ जाने से उनकी स्थिति में सुधार हुआ है। भाषा एक दूसरे को आपस में जोड़ने का सबसे सरल और सशक्त माध्यम है। हमारी हिंदी हमारे भारतवर्ष के लिए इसी माध्यम का कार्य करती है।
14 सितंबर 1949 को हिंदी को हमारे हृदय की अधिश्वरी जानकर उसे संविधान के पृष्ठों में राजभाषा का सम्मान प्रदान किया गया। इसी कारण इस दिन हम लोग हर वर्ष हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं और विचार करते हैं कि हिंदी के विकास के लिए क्या करना चाहिए, ऐसा करना क्यों आवश्यक है और उसकी प्रासंगिकता क्या है।


एक भाषा के रूप में हिंदी की विकास यात्रा बहुत लंबी सतत व समग्र रही है। संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, प्राकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से अवहट्ट, अवहट्ट से पुरानी हिंदी और पुरानी हिंदी से आधुनिक हिंदी का विकास हुआ जो आज हमारे बोलचाल की भाषा है। वैसे इस बात को लेकर भाषा विज्ञानियों में मतभेद है कि अपभ्रंश से हिंदी का उदय हुआ था या पुरानी हिंदी से पर वर्तमान में यही प्रचलित है की पुरानी हिंदी से ही आधुनिक हिंदी का विकास हुआ है।
हिंदी में भाषा, व्याकरण, साहित्य, कला, संगीत इत्यादि सभी माध्यमों में अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए अपनी प्रासंगिकता सिद्ध की है। हिंदी को प्राप्त हुआ यह स्थान हिंदी के सेवकों, साधकों और हिंदी भाषियों के कारण ही है। हिंदी एक सरल और सुगम भाषा है। यही कारण है कि आज यह सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। दुख का कारण यह है कि हिंदी भाषी लोगों का एक समुदाय अंग्रेजी को अधिक महत्व दे रहा है और हिंदी की मानहानि करने का प्रयास कर रहा है। वर्तमान समय में हिंदी की प्रासंगिकता को समाज में स्थापित करना कदाचित इसलिए ही आवश्यक प्रतीत होता है।
अंग्रेजी का महिमा मंडन करते समय और बोलते समय हम यह भूल जाते हैं कि हम जो बोल रहे हैं, वह मात्र एक अनुवाद है, हमारा मूल भाव नहीं क्योंकि हमारे मौलिक तो विचार हमारी मातृभाषा में ही आते हैं। कदाचित इसी विचार को दृष्टिपथ में रखकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने की बात करती है। शिक्षा का माध्यम वही होना चाहिए जिसमें मां के विचारों का उदय होता है क्योंकि शिक्षा विचार करना और विचार रखना सिखाती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के शब्दों में –
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।।
और
अंग्रेजी पढ़ि के जदपी सब गुन होत प्रवीण।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन को हीन।।
हिंदी भाषा एक समर्थ भाषा है जहां अंग्रेजी की मूल शब्दावली में लगभग दस हजार शब्द होंगे वही हिंदी ढाई लाख मूल शब्दों से अधिक किस स्वामिनी है। इतने पर भी यह कैसी विडंबना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो उस भाषा के प्रति आज भी इतनी उपेक्षा व अवज्ञा दिखती है। प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति हिंदी भाषा को आसानी से बोल-समझ लेता है, इसलिए इसे सामान्य जनता की भाषा अर्थात् जनभाषा कहा गया है। हिंदी भाषा एक दूसरे के साथ बातचीत करने के लिए बहुत आसान और सरल माध्यम प्रदान करती है। यह प्रेम, मिलन और सौहार्द की भाषा है। हिंदी विविध भारत को एकता के सूत्र में पिरोने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हिंदी के प्रयोग एवं प्रचार हेतु मनाया जाने वाला हिंदी-दिवस न केवल हिंदी के प्रयोग का अवसर प्रदान करता है, बल्कि इस बात का ज्ञान भी दिलाता है कि हिंदी का प्रयोग भारतीय जनता का अधिकार है, जिसे उनसे छीना नहीं जा सकता है।

हम जानते हैं कि इतने बड़े जनसमुदाय वाले देश में अपने अधिकार की लड़ाई लड़ना आसान नहीं है। यदि महात्मा गांधी, स्वामी दयानन्द सरस्वती, पण्डित मदनमोहन मालवीय, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन, आचार्य केशव सेन, काका कालेलकर, गोविन्दवल्लभ पन्त जैसे अनेको महान व्यक्तियों के अथक प्रयासों से हमें हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने का अधिकार मिला है तो उसे हम छोड़े क्यों ?

हिंदी हमारी मातृ भाषा है और हमें इसका आदर और सम्मान करना चाहिए। देश में तकनीकी और आर्थिक समृद्धि के एक साथ विकास के कारण हिंदी ने कहीं ना कहीं अपना महत्ता खो दी है। आज हिंदी भाषा में अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन तेजी से बढ़ने लगा है।

बहुत से बड़े समाचार पत्रों में भी अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का उपयोग किया जाने लगा है। जो हिंदी भाषा के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। रही सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है। जहां सॉफ्टवेयर की मदद से रूपांतर कर अंग्रेजी से हिंदी भाषा बनाई जाती है। जिसमें ना मात्रा का ख्याल रहता है और ना ही शुद्ध वर्तनी का। वर्तमान समय में हिंदी भाषा के समाचार पत्र व पत्रिकाएं धड़ाधड़ बंद हो रही हैं।

किसी भी देश की भाषा और संस्कृति उस देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हिंदी और देवनागरी के मानकीकरण की दिशा में अनेक क्षेत्रों में प्रयास हुए हैं। हिंदी भारत की संपर्क भाषा भी है। अतः हम कह सकते हैं कि हिंदी एक समृद्ध भाषा है। भारत की राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने में हिंदी भाषा का बहुत बड़ा योगदान है।

हिंदी दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम पूरे मनोयोग से हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना निस्वार्थ सहयोग प्रदान कर हिंदी भाषा के बल पर भारत को फिर से विश्व गुरु बनवाने का सकारात्मक प्रयास करेंगें। अब तो कंप्यूटर पर भी हिंदी भाषा में सब काम होने लगे हैं। कंप्यूटर पर हिंदी भाषा के अनेकों सॉफ्टवेयर मौजूद हैं जिनकी सहायता से हम आसानी से कार्य कर सकते हैं।

कोई भी भाषा तब और भी समृध्द मानी जाती है, जब उसका साहित्य भी समृध्द हो। आदिकाल से अब तक हिंदी के आचार्यों, संतों, कवियों, विद्वानों, लेखकों एवं हिंदी-प्रेमियों ने अपने ग्रंथों, रचनाओं एवं लेखों से हिंदी को समृध्द किया है, परंतु हमारा भी कर्तव्य है कि हम अपने विचारों, भावों एवं मतों को विविध विधाओं के माध्यम से हिंदी में अभिव्यक्त करें एवं इसकी समृध्दि में अपना योगदान दें। हिंदी के विकास के लिए हमें निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।


कबीरदास के शब्दों में-
बोली हमारी पूर्व की, हमें लखै नहिं कोय।
हमको तो सोई लखै, जो धुर पूरब का होय॥