भुजंतप्रयात् छंद (सामयिक)
लगा दाॅंव बैठे सभा में जुॅंआरी।
खड़ी द्रौपदी-सी प्रजा है हमारी।
लिए कर्ज का बोझ ढोती बिचारी।
करो त्राण आओ बचाओ मुरारी।।
झुकाए खड़ी शीश माता हमारी।
सभा बीच मौनी व्रती-सी बिचारी।
पुकारूं किसे आज पापी प्रतापी।
धरा डोलती-सी दिखी आज काॅंपी।।
ठगा बंग भी था ठगे थे बिहारी।
बने मूक बैठे हितैषी पुजारी।
नहीं आ रही लाज कैसे बताऊं।
हरें संसदी चीर क्या-क्या बचाऊं।।
हमें रोकना है शराबी कबाबी।
भला विश्व को क्यों दिखी है खराबी।
उठें पेट में जो मरोड़ें हटाओ।
लगे बाड़ सीमा-सुरक्षा बढ़ाओ।।
संतोष हिन्दवी, लखनऊ

