माँ और अचार- Rupa Kumari

स्वधा जब भी मायके जाती तो अपनी मम्मी के हाथों के बने आम के अचार लेकर ही वापस आती थी। स्वधा को माँ के हाथों के बने अचार बड़े ही अच्छे लगते थे। उसकी माँ कई तरह के अचार बनाया करती थीं– आम, लाल मिर्च, हरी मिर्च, आंवला, कटहल, बड़हर, मूली, गाजर, मटर और न जाने किस-किस चीज़ों के अचार। उनके हाथों में मानो जादू था। हर अचार स्वाद से भरपूर पर स्वधा को सबसे अधिक मज़ा आम के अचार खाने में आता था। शादी के पहले वह अपनी माँ की मदद किया करती थी अचार बनाने में। शादी के बाद उसे कभी मौका ही नहीं मिला अचार बनाने का क्योंकि हर साल माँ उसके लिए बड़े-बड़े कनस्तर में अचार भिजवा दिया करती थीं।
पिछले साल स्वधा की माँ का निधन हुआ था। इस बार वह मायके तो गई पर न माँ मिली, न माँ का स्नेह और न ही माँ का अचार। वापसी में उसकी आठ वर्षीया बेटी रोली ने पूछा, “माँ इस बार हम नानी के घर से अचार क्यों नहीं लाए?”
स्वधा ने अपनी आँखों से आँसू पोंछते हुए कहा, “इस बार घर जाकर मैं अचार बनाऊँगी।”
गर्मी का मौसम था ही और बाजार में कच्चे आम मिल रहे थे तो वह घर पहुँचने के दूसरे दिन ही आम के अचार बनाने में जुट गई। उसने अपनी माँ को जैसा करते देखा था वैसा ही किया और कुछ दिनों में स्वादिष्ट अचार बनकर तैयार हो गया। स्वधा की बेटी को अपनी माँ के हाथों से बने अचार बड़े ही स्वादिष्ट लगे। स्वधा को भी अचार बनाकर खुशी मिलती पर उसे अचार में अपनी माँ का स्वाद नहीं मिलता। अब तो उसकी बेटी रोली की भी शादी हो गई है। वह भी हर साल स्वधा के हाथों के बने अचार साथ ले जाया करती है।
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स्वरचित -रूपा कुमारी ‘अनंत’
राँची, झारखंड
