घर की स्त्री ही घर की अन्नपूर्णा है

शीर्षक — घर की स्त्री ही घर की अन्नपूर्णा है

कल मैं एक विवाह समारोह के बाद पारिवारिक रस्म चौक छुआई में गई थी। घर में खुशी का माहौल था। सभी लोग नई बहू के हाथों से बने किसी नए स्वाद का इंतजार कर रहे थे। रस्म के अनुसार बहू ने हलुआ बनाया और घर के एक-एक सदस्य को बड़े प्रेम से परोसा। सभी ने अपने-अपने अंदाज़ में उसकी तारीफ़ की और नेग भी दिया।

उसी समय बहू के सबसे छोटे चाचा-ससुर, जिन्हें स्वभाव से थोड़ा सिरफिरा कहा जाता है, उनकी कही बातों ने मेरे मन पर एक अमिट छाप छोड़ दी। वे हलुआ खाकर बहुत प्रसन्न हुए और बोले,



“अरे, आज हलुआ बड़े गज़ब के स्वाद का बना है। लगता है जैसे आज फिर से देवी माँ किसी नए रूप में हमारे घर की रसोई में पधारी हैं। वाह, क्या स्वाद है!”

तभी किसी ने उनकी बात काटते हुए कहा,
“अरे, यह हलुआ तो नई बहू ने बनाया है।”

वे मुस्कराए और बोले,

“तुम्हें क्या पता! बल्कि मैं दावे से कह सकता हूँ कि हमारे समाज के 99% पुरुष या तो पहचानते नहीं, या फिर अपनी साख कम न हो जाए इसलिए स्वीकार ही नहीं करते कि माँ, बहन, भाभी, पत्नी, बेटी या बहू — जो भी स्त्री 45 डिग्री तापमान में हमारे लिए पसीना बहाकर भोजन बनाती है — क्या वह अन्नपूर्णा से कम है?



अगर हमारे जीवन में ये घर की स्त्रियाँ न हों, तो हमारा क्या वजूद रह जाए? हम दो रोटी के लिए भी तरस उठें। इतना ही नहीं, ये स्त्रियाँ दूसरे घर से आकर हमारे घर को अपना बनाती हैं, उसे सजाती हैं, सँवारती हैं, रिश्तों को जोड़ती हैं। फिर क्या ये उस परमात्मा से कम हैं? मैंने तो इनके रूप में ही देवी माँ को पाया है। मैं किसी देवी-देवता को नहीं मानता, क्योंकि मेरे लिए तो घर की स्त्री ही देवी है।”

फिर उन्होंने एक और गहरी बात कही,

“एक पिता के चले जाने पर भी माँ कष्ट सहकर बच्चों को पाल लेती है, लेकिन क्या हर पिता उसी निस्वार्थ रूप में सब कुछ निभा पाता है? नहीं। इसलिए स्त्री सचमुच देवी है।”

उनकी बातें सुनकर सच मानिए, मुझे स्वयं पर गर्व महसूस होने लगा। तब मैंने उनसे कहा,

“अगर सभी लोग आपकी तरह सोचने लगें, तो साल में केवल एक दिन महिला दिवस मनाकर सम्मान देने की नौबत ही न आए।”

उस क्षण मुझे लगा कि स्त्री का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उसकी भूमिका को हृदय से स्वीकार करने में है। घर की स्त्री केवल भोजन बनाने वाली नहीं होती, वह घर की धड़कन, परिवार की आत्मा और जीवन की अन्नपूर्णा होती है।
जरूरत है उसके सही सम्मान की उसे और कुछ नही चाहिए …न कोई नेग …न कोई उपहार !!

स्वरचित :- अंजू मल्लिक
पटना बिहार 

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