डॉ रजनी शाह की सद्य प्रकाशित कविता संग्रह उजालों के बदलते रंग का ऑनलाइन लोकार्पण संपन्न हुआ

बेंगलुरु 5 मार्च – शब्द शब्द दर्पण संस्था के तत्वधान में आज डॉ. रजनी शाह की सद्य प्रकाशित कविता संग्रह उजालों के बदलते रंग का ऑनलाइन लोकार्पण संपन्न हुआ और पुस्तक की समीक्षा वार्ता भी आयोजित हुई कार्यक्रम प्रारंभ होते ही सूत्रधा कुँ० प्रवल प्रताप सिंह राणा प्रवल ने अनुवादक अधिकारी और साहित्यकार राधेश्याम यादव सुदर्शन जी को मां सरस्वती की वंदना के लिए आमंत्रित किया जिन्होंने सुमधुर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की इसके पश्चात मुख्य अतिथि डॉ विनय कुमार यादव, राधेश्याम यादव सुदर्शन, लेखिका डॉ. रजनी शाह और कुँ० प्रवल प्रताप सिंह राणा प्रवल ने पुस्तक का लोकार्पण किया और सभी ने करतल ध्वनि से इस महत्वपूर्ण पल को एक उत्साह पूर्वक इवेंट में बदल दिया लोकार्पण के पश्चात सूत्रधार ने वरिष्ठ शिक्षाविद और साहित्यकार डॉ. विनय कुमार यादव को बोलने हेतु आमंत्रित किया जिन्होंने बताया की किस प्रकार डॉ. रजनी शाह निराला की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं और अपने स्पष्ट और ऊर्जावान लेखन से इस परंपरा को न सिर्फ जीवित रखे हैं बल्कि नए आयाम भी दे रही हैं उन्होंने बताया कि डॉ. रजनी शाह ने पुस्तक में छंद मुक्त कविताएं लिखी हैं और बहुत समय बाद ऐसा संग्रह है जिसमें प्रथम कविता से लेकर 75 वीं कविता तक सभी एक तारतम्य में है ऐसा लगता है कि यह किसी के जीवन के घटनाक्रम या किसी व्यक्ति के जीवन की प्रथम से लेकर 75 वीं कड़ी के रूप में दिखती है कविताओं को क्रम देकर और घटनाओं के आरोही या अवरोही क्रम में रखना यह परंपरा भी लुप्त हो रही थी लेकिन डॉ. रजनी शाह ने इस तरीके से प्रस्तुत कर एक बहुत अच्छा कार्य किया है इसके पश्चात डॉ विनय कुमार पाठक ने पुस्तक उजालो के बदलते रंग से अपनी पसंद की तीन रचनाओं का वाचन किया और साथ ही साथ उसकी मीमांसा और समीक्षा भी की डॉ. यादव ने बताया कि पुस्तक पढ़ने के लिए समय कम लगता है लेकिन उसे आत्मसात करने के लिए समय लगता है मैं पुस्तक को पूरी तरह से बार-बार पढ़ूंगा और आत्मसात करूंगा तो एक बार फिर आपके साथ जुड़ूंगा और इस पुस्तक पर पुनः विस्तृत चर्चा करूंगा सूत्रधार महोदय ने डॉ. विनय कुमार यादव का धन्यवाद किया और राधेश्याम यादव सुदर्शन जी को बोलने को आमंत्रित किया राधेश्याम यादव सुदर्शन ने बताया कि डॉ. रजनी शाह का यह संग्रह उनको चमत्कृत कर रहा है क्योंकि इसमें जिस प्रकार से प्रकृति से बात की गई है संबंधों को और समाज को वास्तविक रूप में प्रस्तुत किया गया है बिना कोई अपशब्द कहे या बिना कोई तल्खी लिए हुए साधारण रूप से प्रचलित अपने शब्दों का उपयोग करके कविताओं को उस स्थान पर पहुंचा दिया जहां आप स्वयं कविताओं से जुड़ जाते हैं और उसका एहसास आपको लगातार होता रहता है उन्होंने डॉ. रजनी शाह को शुभकामनाएं भी दीं और कहा कि आप की रचनाएं बहुत अच्छी हैं और आप निरंतर ऐसे ही लिखती रहे इसके पश्चात राधेश्याम यादव सुदर्शन जी ने अपनी पसंद की आधा दर्जन रचनाओं का वाचन किया और साथ-साथ प्रसन्नता व्यक्त की कि कविताओं का वचन करके अच्छा लग रहा है, और भविष्य में भी ऐसी रचनाएं और ऐसी पुस्तकों की प्रतीक्षा में रहूंगा इसके पश्चात डॉ.रजनी शाह को आमंत्रित किया गया उन्होंने बताया कि किस प्रकार से उन्होंने अपने को प्रकृति में समाया है अपने जीवन को सिर्फ साहित्य ही नहीं समाज से भी जोड़ा है जीवन संघर्षों को कई बार शब्दों में व्यक्त किया है और कई बार दूसरों के संघर्षों को और घटनाओं को शब्दों में डालकर कविताओं के रूप में अवतरित किया है उन्होंने बताया कि कविता उनकी किशोरावस्था में ही जन्म ले चुकी थी और किसी भी घटना को और कभी भी व्यक्तियों के द्वारा कहीं बातों को वह अक्सर शब्दों में ढाल लेती थी और आजतक लगातार डायरी में अंकित करती हैं, वही कविताएं आज पुस्तक में छपी हैं और आप सबको आल्हादित कर रही हैं डॉ. रजनी शाह ने यह भी कहा कि लेखन मेरा पैशन है लेखन मेरे लिए जीने का एक सशक्त माध्यम है , लेखन पैसा कमाने के लिए नहीं यदि मुझे लगता है कि मैं नहीं लिख पाती हूं तो लगता है जीवन शायद मृतप्राय हो गया है इसके पश्चात डॉ रजनी शाह ने भी अपनी पसंद की दो रचनाएं प्रस्तुत की और सूत्रधार कुँ० प्रवल प्रताप सिंह राणा प्रवल को आमंत्रित किया कि वह भी पुस्तक के बारे में अपने विचार रखें और अपनी समीक्षा से अवगत कराएं उन्होंने यही कहा कि डॉ रजनी शाह से कार्यक्रमों भेंट होती थी वह साहित्य के प्रति समर्पित दिखती थी लेकिन इतनी अधिक समर्पित है यह नहीं सोचा था जब उनकी यह 75 रचनाओं वाली पुस्तक हाथ में आई तो देखा कि इसमें एक नारी, एक लड़की, एक हिंदी की सेविका का अभी तक का जीवन समाहित है, इन्होंने कितनी बारीकी से घटनाओं को देखा है इन्होंने और बहुत ही सरल शब्दों में उन बारीक बातों को लिख भी दिया है और कई रचनाएं तो एक बार पढ़ने में सीधे-सीधे निकल जाती, लेकिन जब तुम्हारा पढ़ते हैं तो वह हृदय में उतर जाती है और लगता है कि इस कविता को पढ़ते रहें, इस घटना को हम जी रहे हैं इस भावना को हम स्वयं महसूस कर रहे हैं ऐसी लेखिका डॉ. रजनी शाह को शुभकामनाएं और धन्यवाद भी दिया, उनके जीवन दर्शन को भी सराहा और अपनी पसंद की रचना का वाचन भी किया अंत में विशेष अभिभाषण डॉक्टर विनय कुमार यादव जी ने दिया और यह भी घोषणा की कि इस कार्यक्रम के चारों प्रतिभागी इस बात पर सहमत हैं की कविता कहानी नाटक या कोई भी विदा हो उसे विद्या की रचनाओं में रचनाकार का दर्शन झलकता है, उस दर्शन को समझना और समझ पाना ही शायद लेखक की सफलता होती है तो हम उम्मीद करें कि डॉ. रजनी शाह ऐसी ही और रचनाएँ लिखती रहेंगी और हम सबको अवसर मिलेगा उनकी अगली पुस्तक की समीक्षा और विवेचना करने का इसके बाद सुत्रधार कुँ० प्रवल प्रताप सिंह राणा प्रवल ने कार्यक्रम के समापन की घोषणा की दर्शक के रूप में बेंगलोर व देश के अन्य भागों के साहित्यकार व डॉ रजनी शाह के मित्र शामिल रहे।

(कुँ० प्रवल प्रताप सिंह राणा ‘प्रवल’ ,वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, साहित्य 24)