मुक्ति स्वयं में ही ब्रह्मांड
मुक्ति स्वयं में ही ब्रह्मांड
मुक्ति स्वयं में ही प्रकाशमान ब्रह्मांड,
सतीश के घर जन्मी चांदनी समान।
छोटी उम्र में गया पिता का साया,
माँ ने आँचल में अपना घर बसाया।
भाभी और भैया ने थामा उसका हाथ,
मुक्ति ने सीखा जीना, रोकर भी साथ।
सपनों में आया एक सजीला साथी,
था आनंद वो थी झूमती गाती।
मधु सी थी डगर जहाँ, प्यारा मिला परिवार,
हाथ उठाकर आकाश को, किया प्रभु का आभार।
लेकिन प्रमोद सपनों में भी नहीं था, वो उस घर से जा चुका था,
तो आनंद भी हकीकत में नहीं था, वो भी अधूरा बन चुका था।
गुड़गाँव में छोटा सा सपनों का घर बनाया था,
पर वो उसे कभी वहाँ लेकर ही न आया था।
इसी तरह आठ साल बीते, चौखट न खुली,
उसे कठपुतली बनाया किस्मत थी उसकी धुली।
फिर एक दिन हुआ हादसा बड़ा,
जीवन बदला और हो गया खड़ा।
मायके में तीन साल तक दर्द सही वो न आया,
बीच में आया ऑपरेशन करवाया फिर वहीं छोड़ गया।
आशा थी इसलिए उसने हार नहीं मानी,
आंसुओ में दोबारा ढूँढी अपनी कहानी।
फिर अकेला ही विदेश वो चला गया कहा अगले साल ले जाउंगा,
और अगले साल करते करते कहा क्या कर लोगी यदि नहीं लाऊंगा।
दो साल बाद ले जाने का नाटक समझ में आया।
तब फिर जबरदस्ती उसने वीज़ा लगवाया।
विदेश में वहां तो शराब और सिगरेट में डूबा था वो इंसान,
अहम् से भरा अपनी ही पत्नी के लिए बन गया था हैवान।
जाते ही दो महीने बाद बोला वापिस जा तू क्यों आई,
माँ की बन नौकरानी और मेरे भाई को देनी होगी कमाई।
पहली बार मना किया तो रोज रात दिन होती थी लड़ाई।
एक दिन चला गया, अब आगे कुआँ और पीछे थी खाई।
अपने सारे कॉन्टैक्ट ईमेल उसने बंद कर दिए,
मां और भाई सबने होंठ लिए
थे सिये।
ताकि वह विदेश मे अकेली डर जाए,
और टूट कर वापस भारत चली जाए।
अब वहाँ सिर्फ एक उसका लड्डू गोपाल ही था,
जिसे अपना समझा, वो तो कलाकार कमाल ही था।
अब तीन महीने से प्रतीक्षा कर रही है,
दुकान पर सलाद काटती बर्तन मांज रही है।
अभी कर रही है पीएचडी की तैयारी,
कहती है भगवान ने चाहा तो राह बनेगी सारी।
फिर मुस्कराकर बोलती है धीरे से, जरूरत हुई तो केस करूँगी,
वरना जिम्मेदारियों से भागने, वाले इंसान का क्या करूँगी।
पत्नी की ही जिम्मेदारी से है उसने मुंह मोड़ा,
और अब इंसानियत का साथ है उसने छोड़ा।
प्रमोद के सपनों में था आनंद और मुक्ति का संग,
मगर स्वयं की गलती से खो बैठा वो जीवन का ये भी रंग।
कर्मों की ही वापसी जब उसके आएगी सामने,
तब फिर अकेला ही पत्नी को ढूँढ़ेगा इस जहाँ में।
अभी कौन समझाए कि समय का पहिया न रोक पाओगे,
वह बन जाएगी मंजिल और तुम रास्ता बनके रह जाओगे।
माँ कहती है, जानबूझकर नहीं किया उसने बच्चा,
केस कर बेटा तुझे ताकि न्याय मिले सच्चा।
भगवान का दिया एक स्त्री को यह वरदान उसने तेरा है छीना,
तेरी उम्र निकाल दी, बिन औलाद के बनाया जीवन जीना।
भाई-भाभी सब हितेषियों ने तब
उसे समझाया,
सहमति से मिलकर वहां कानूनी रास्ता अपनाया।
पर मुक्ति अब भी चुपचाप खड़ी है,
सारी जिंदगी चाहे सामने पड़ी है।
कहती है जाने दो, वो इंसान अच्छे हैं,
माँ के गलत सिखाए हुए नादान बच्चे हैं।
अब प्रभु से विनती है, कि मुक्ति साइन करे ताकि न्याय मिले,
या भगवान पति को बुद्धि दे, और उसके साथ जिंदगी खिले।
वो फिर मुस्कुराए, नई दिशा पाए,
उसका ही पति उसके जीवन में खुशियां लाए।
माँ की तपस्या, बेटी की आठ साल रिश्ता बचाने की मेहनत,
भगवान के घर में अंधेर नहीं है,
मिलेगी उनसे उसे पूरी हिम्मत।
पर अब मुक्ति न टूटे, न थमे, न झुके, बस बढ़े,
वह अपने में एक ब्रह्मांड है, चले बस चले, और चले।
मुक्ति
