नोबेल पुरस्कार का हकदार हूं… हास्य व्यंग्य

नोबेल पुरस्कार का हकदार हूं… हास्य व्यंग्य

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नोबेल पुरस्कार के लिये भारतीय साहित्यकारों ने हूंकार भरना शुरू कर दिया है। अपने को प्रबल दावेदार समझने वाले साहित्यकार अपने-अपने को हकदार समझ रहे हैं। हर कोई अपनी तारीफ का पुल बांध रहा है तथा दूसरे की टांग खींचने में लगा है।

एक बुजुर्ग साहित्यकार ने अदब से अपनी बात रखी। अंतिम समय है मिल जाता तो जनम सफल हो जाता। रात- रात जाग कर बड़ी-बड़ी पोथी लिखा हूं। जवानी के समय पर प्रेमरस से भरी  रचनायें जिसमें नायिकाओं के विरह वेदना का सचित्र वर्णन किया हूं। मेरी रचनाओं में एक विरहिणी का सम्पूर्ण दर्द को उकेरा हूं।

एक युवा कवि पर चर्चा जोर पकड़ लिया है। जिसकी रचना दया, परोपकार, इंसानियत की पुरजोर वकालत करती है। बुजुर्ग साहित्यकार ने अपना तेवर तेज कर दिया। नहले पर दहला, दहले पर नहला फेंकना चालू कर दिये। 

ये कल का पैदा अपने अंदर कौन सी विद्वत्ता हासिल कर ली है। इनकी रचनाओं में फूहड़ता है। इनकी रचनायें अनपढ़ भी समझ लेता है। ऐसी रचनाये निम्न श्रेणी की हैं। अनुभव ने नौसिखिये को शब्दों के माया जाल में फंसाना चालू कर दिया।

हमने गंभीरता से परिपूर्ण रचनाओं की उत्पत्ति की है। क्लिष्ट शब्दों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग हुआ है। मेरी विद्वतापूर्ण रचनाओं की व्याख्या एक से एक विद्वान नहीं कर सके। ये साधारण पाठकों की क्या औकात है ? मेरी रचनाओं के भाव जिंदगी भर नहीं समझ सकेंगें।

अपनी रचनाओं में ऐसी विद्वत्ता की माला पहना दिये हैं कि  नोबेल देने वाली संस्था के टीम के लोग भी पसीना त्यज देंगें। कोई विद्वान मुझसे मुकाबला नहीं कर सकता है। मेरे कठिन शब्दों की प्रवाह में सब बह जायेंगें‌ कोई टिकने वाला नहीं है। 

इस तरह से मैं हकदार हूं। नोबेल पुरस्कार मुझसे कोई नहीं छिन सकता है। नोबेल के विद्वानों को एक भी बात समझ न आ सकी। अंत में युवा रचनाकार को नोबेल के लिये चुन लिया गया।

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जयचन्द प्रजापति

प्रयागराज